Friday, January 10, 2020

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हिंदी निबंध शीर्षक




गणतंत्र दिवस

स्वतंत्रता दिवस

वाचन दिवस

गांधी जयंती

महिला दिवस

महाराष्ट्र दिवस

दीवाली

होली

रक्षाबंधन

क्रिसमस

ईद

विज्ञान दिवस

मेरी प्रथम रेल यात्रा

भ्रष्टाचार एक समस्या 

जल ही जीवन है

डॉ. ऐ. पी. जे. अब्दुल कलाम

समय का सदुपयोग

दहेज एक अभिशाप

विज्ञान वरदान या अभिशाप

जनसंख्या वृद्धि एक अभिशाप

स्वामी विवेकानंद

मेरी प्रथम विदेश यात्रा

भारतीय प्रधानमंत्री : श्री नरेंद्र मोदी

मेरा प्रिय कवि : तुलसीदास 

आतंकवाद : समस्या और समाधान  

नारी और समाज

समाज का बदलता स्वरूप

तेजी से बदलती मुंबई

मेरे जीवन का लक्ष्य

आधुनिक जीवन की समस्या

राजभाषा हिंदी : दशा और

बाल श्रमिक

मजदूर दिवस

वन रहेंगे – हम रहेंगे

शिक्षा और रोजगार

बढ़ती तकनीक : सुविधा या समस्या

प्राकृतिक आपदा

भारत में बेकारी की समस्या

मेरा प्रिय त्योहार

देशाटन या पर्यटन

सैर का महत्व

आदर्श विद्यार्थी

भिखारी समस्या

मेरा प्रिय नेता

विद्यार्थियों में बढ़ता असंतोष

पर्यावरण और हम

शिक्षित वर्ग में बेकारी की समस्या

चिड़िया घर की सैर

फिल्म सिटी की सैर

जीवन में मनोरंजन का महत्व

समुद्र तट की सैर

गाँव का बदलता रूप

कितना बदल गया मेरा गाँव

मेरा अपना गाँव

मेरा शहर

मेरा देश

भूमंडलीकरण

पिकनिक का एक दिन

सैर

मेरी बस यात्रा

शिक्षा का गिरता स्तर

स्वदेश प्रेम

राजनीति और भ्रष्टाचार

मातृभूमि

मातृभूमि के प्रति हमारे कर्तव्य

पुस्तकालय और उसका उपयोग

सामाजिक जीवन में बढ़ता भ्रष्टाचार

मेले में बिताया एक दिन

पुस्तक प्रदर्शनी में बिताया एक घंटा

मेरा प्रिय खेल

विज्ञान के चमत्कार

यदि हिमालय न होता ..

अंधविश्वास

आज का युग कंप्यूटर का युग

निसर्ग संदेश

बेटी बचाओ बेटी पढ़ाओ अभियान

सबसे मजेदार क्षण

सुबह की सैर

स्कूल में ड्रेस कोड

टी.वी. विज्ञापनों पर प्रतिबन्ध लगाया जाए

एक सैनिक की आत्मकथा

पर्वतीय सौंदर्य

एक बंदी की आत्मकथा

वर्षा / बरसात का एक दिन

मेरे सपनों का भारत

छुट्टी का एक दिन

साम्प्रदायिकता : एक अभिशाप

आँखों देखी दुर्घटना

पुस्तकों का महत्व

फैशन का भूत

मोबाइल फ़ोन : लाभ और हानि

हमारा भारत

बस अड्डे का दृश्य

नैतिक पतन : राष्ट्र का पतन

लड़का – लड़की एक समान

मेरी प्रिय भाषा हिंदी

समय, धन से बढ़कर

आज की भारतीय नारी

बरसात की एक भयानक रात

मेघ की आत्मकथा

किसी प्रदर्शनी का आँखों देखा वर्णन

वन-महोत्सव

संगणक आज की मांग/जरूरत

समुद्रतटीय त्रासदी

व्यावसायिक शिक्षा

प्रदूषण : कारण और निवारण

प्रदूषण एक गहन समस्या

बेटी बचाओ, बेटी पढ़ाओ

पढेगी लड़की, बढ़ेगा समाज

यदि मैं शिक्षामंत्री होता तो ...

बाढ़ का विनाशकारी दृश्य

राष्ट्रीय एकता

विज्ञान की देन

जीवन में खेलों का महत्व

मंहगाई की समस्या

अनुशासन

दूरदर्शन के लाभ-हानि

मेरा प्रिय मित्र

मेरी प्रिय ऋतु

पेड़ पोधे और हम

मेरे जीवन का आदर्श

राष्ट्र के प्रति हमारा कर्तव्य

यदि मैं अध्यापक होता तो ...

यदि मैं प्रधानमंत्री होता तो ...

यदि मैं समाजसेवक होता तो ...

यदि मैं खिलाड़ी होता तो ...

यदि मैं गायक होता तो ...

यदि मैं प्रधानाचार्य होता तो ...

हम होंगे कामयाब एक दिन

प्लास्टिक की दुनिया

प्लास्टिक : एक अभिशाप

हमारे राष्ट्रीय पर्व / त्योहार

यदि मैं पूंजीपति होता तो ...

इक्कीसवीं सदी का भारत

वर्तमान भारत

अनूठा भारत

सभ्यता और संस्कृति का भारत

अनेकता में एकता का प्रतिक भारत

भारतीय किसान

किसान की आत्मकथा

पुस्तक की आत्मकथा

पेड़ की आत्मकथा

बूढ़े की आत्मकथा

पेंसिल की आत्मकथा

पुराने घर की आत्मकथा

शिक्षक की आत्मकथा

एक बच्चे की आत्मकथा

स्वंय पर विश्वास

माँ की आत्मकथा

साईकिल की आत्मकथा

नदी की आत्मकथा

सत्यमेव जयते

त्यौहारों का जीवन में महत्व

यदि सूरज न होता

जीवन में गुरु महत्व

सर्कस का आँखों देखा वर्णन

यदि मैं पुलिस अधिकारी होती ...

कन्या भ्रूणहत्या

अख़बार पढने की आदत

यदि आप अदृश्य हो जाते हैं ...

सकारात्मक स्वभाव

विज्ञापन समय की मांग

पृथ्वी मेरा ग्रह


समय अनमोल है 

देश-विदेश की सैर

करत-करत अभ्यास के जड़मति होत सुजान

जो हुआ अच्छा हुआ

टेलीविज़न के लाभ तथा हानियाँ

स्वच्छ भारत अभियान

स्वस्थ भारत

समाज और कुप्रथाएँ

आतंकवाद और समाज

कल का भारत

21वीं सदी का भारत

पुस्तकालय का महत्व

विवाह एक सामाजिक संस्था

प्रदूषण का प्रकोप

रेगिस्तान की यात्रा

मेरे प्रिय नेता नेताजी सुभाष चंद्रबोस

राष्ट्रीय शिक्षा-नीति

भारत में शिक्षा का प्रसार

मन के हारे हार है

साहित्य और समाज

साहित्यकार का दायित्व

साहित्य का उद्देश्य

मेरी इच्छा

मेरी जीवनाकांक्षा

विज्ञान और मानव-कल्याण

आज के गांव

राष्ट्रभाषा और प्रादेशिक भाषाएँ

मनोरंजन के साधन

साक्षरता क्यों आवश्यक है?

अध्ययन के लाभ

शिक्षा का माध्यम

शिक्षा में त्रिभाषा सूत्र

गांवों में शिक्षा

शिक्षा और परीक्षा

प्रौढ़ शिक्षा

महाविद्यालय का पहला दिन

राष्ट्रभाषा की समस्या

समाचार-पत्र

गांधीवाद और भारत

दशहरा/ विजयदशमी

भारत-चीन संबंध

शराब-बंदी

लोकतंत्र में चुनाव का महत्व

शिक्षा और रोजगार

भारत का संविधान

लघु उद्योग

कुटीर उद्योग

परिवार नियोजन

मीराबाई

पंडित जवाहरलाल नेहरू

सादा जीवन उच्च विचार

अंत भला तो सब भला

पराधी सपनेहुं सुख नाहीं

बिजली : आधुनिक जीवन की रीढ़

युद्ध के लाभ और हानियाँ

भारत का अंतरिक्ष कार्यक्रम

गर्मी का एक दिन

विज्ञान और युद्ध

विज्ञान और शिक्षा

विज्ञान और धर्म

निरस्त्रीकरण

सूरदास

सूर्यकांत त्रिपाठी ‘निराला’

सुमित्रानंदन पंत


राष्ट्रकवि मैथिलीशरण गुप्त

श्रीमती महादेवी वर्मा

नारी और नौकरी

पयर्टन-उद्योग

यातायात की समस्या

बंधुआ मजदूर

प्लेटफॉर्म का एक दृश्य

हड़ताल

डॉ. सर्वपल्ली राधाकृष्णन

डॉ. राजेंद्र प्रसाद

डॉ. विक्रम अंबालाल साराभाई

डॉ. जाकिर हुसैन

चंद्रशेखर आजाद

मदनमोहन मालवीय

लौह पुरुष सरदार वल्लभभाई पटेल

पंडित गोविंद बल्लभ पंत

राजा राममोहन राय

मेरा प्रिय खेल : क्रिकेट

ओलंपिक : खेल आयोजन

राष्ट्र-निर्माण और नारी

भारतीय समाज में कुरीतियाँ

ताजमहल का सौंदर्य

मत्स्य-पालन

मृदा प्रदूषण

ध्वनि-प्रदूषण

वायु-प्रदूषण

जल प्रदूषण

बाल मजदूरी की समस्या

छात्रावास का जीवन

ऊर्जा के स्त्रोत और समस्या

जनसंख्या, समस्या और शिक्षा

शहरीकरण के कुप्रभाव

रेडियो का महत्व

हमारा राष्ट्रध्वज

डाकिया

सहशिक्षा का महत्व

लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक

अरविंद घोष

लाल लाजपत राय

भगत सिंह

रामप्रसाद ‘बिस्मिल’

मंगल पांडे

मौलाना अबुल कलाम आजाद

खुदीराम बोस

अशफाक उल्लाह खां

एड्स

पुरुषोत्तमदास टंडन

तात्या टोपे

Tuesday, January 7, 2020

चार अलग अलग रिपोर्ट्स ' हिंदी के श्रेष्ठ बाल नाटक' के विमोचन पर।





























*हिंदी के श्रेष्ठ बाल नाटक का विमोचन संपन्न*

 सांताक्रूज, मुंबई, 4 जनवरी 2020, वैदिक दर्शन प्रतिष्ठान के तत्वाधान में आयोजित पुस्तक के विमोचन का आयोजन सफलतापूर्वक संपन्न हुआ। आयोजन की रूपरेखा तीन चरणों में  विभाजित की गई थी। समूचे कार्यक्रम के अध्यक्ष डॉक्टर सुधाकर मिश्रा और डॉक्टर शीतला प्रसाद दुबे जी थे। पहले चरण में तीन लेखकों द्वारा लिखित नाटक संग्रह जिसका नाम 'हिंदी के श्रेष्ठ बाल नाटक' का विमोचन किया गया। नाटक संग्रह के रचना प्रक्रिया का उल्लेख करते हुए पुस्तक में शामिल लेखक, जनाब असलम मुलानी ने अपने विद्यालय के भूतपूर्व प्राचार्य श्री चतुर्वेदी जी को समर्पित किया। बकौल जनाब असलम नाटक लिखने की प्रेरणा उन्हें चतुर्वेदी जी से प्राप्त हुआ था। इसी कड़ी में पुस्तक में शामिल लेखिका, डॉक्टर पूजा हेमकुमार अलापुरिया जी ने कहा कि, नाटक किशोर मन को रचनात्मकता की ओर प्रेरित करते हैं। इनके माध्यम से उनकी अनियंत्रित ऊर्जा को रचनात्मकता की ओर मोड़ा जा सकता है। यह परखा हुआ सच है ऐसा उन्होंने किया है और इसलिए पूरे अधिकार के साथ इस बात को अपने वक्तव्य में कह रही थी। 
नाटक संग्रह के तीसरे महत्वपूर्ण लेखक तथा समूचे पुस्तक के संपादक डॉक्टर जितेंद्र पांडे जी ने  कहा कि, "नाटक चरित्र निर्माण का सशक्त माध्यम होता है। " और यह बाद भी पका हुआ सच है, कोई मोहनदास जब सत्यवादी हरिश्चंद्र से संबंधित नाटक को देखता है तो उसके जीवन में सत्य के प्रति आग्रह एक आंदोलन का रूप लेकर विकसित होने लगता है। भारत का आधुनिक इतिहास इस बात का प्रत्यक्ष प्रमाण भी है। पुस्तक के संबंध में सबसे उल्लेखनीय वक्तव्य युवा साहित्यकार श्री पवन तिवारी जी ने दिया। अपने वक्तव्य के दौरान उन्होंने पुस्तक के शीर्षक पर टिप्पणी करते हुए उसमें ध्वनित शब्द श्रेष्ठ पर एक बार तो दर्शकों के मन में आलोचनात्मक मंथन का बीज भी बो दिया था। उन्होंने सवाल किया कि, "कोई कृति पढ़े जाने से पहले ही श्रेष्ठ कैसे घोषित हो सकती है? " लगा जैसे लेखकों और प्रकाशकों की उपस्थिति में श्री पवन तिवारी जी एक जोरदार वैचारिक आक्रमण करने वाले हैं। जिसका समाधान दे पाना कठिन नहीं तो श्रम साध्य अवश्य हो जाएगा। किंतु उन्होंने ही स्वयं इस बात की घोषणा की कि, "रचना प्रक्रिया के दौरान ही यह सभी नाटक इतनी मूर्धन्य लोगों की नजरों से होकर गुजरा है इन्हें इतनी कसौटी ऊपर कसा गया है, जिसको देखते हुए इसकी श्रेष्ठता में कोई संदेह नहीं रह जाता। शीर्षक में श्रेष्ठ शब्द का होना लेखक त्रय का आत्मविश्वास भी  प्रदर्शित करता है।"
लेखकों के आत्मविश्वास को श्री पवन तिवारी जी ने निराला जी के आत्मविश्वास के साथ जोड़ कर देखा। 
'हिंदी के श्रेष्ठ बाल नाटक' पुस्तक विमोचन के बाद 'मनुस्मृति भारत का आदि संविधान' विषय पर परिसंवाद का दूसरा सोपान आरंभ हुआ। इस चर्चा में भाग लेने के लिए, मुंबई से श्री संदीप आर्य और योगेश आर्यावर्ती  तथा हरिद्वार से पधारे प्रमुख अतिथि स्वामी यज्ञदेव जी उपस्थित थे। चर्चा का आरंभ पंडित नरेंद्र शास्त्री जी ने कर्णप्रिय सो मधुर राजस्थानी गीत से किया जो भगवान मनु के  प्रति स्तुति भावना से प्रेरित था। परिसंवाद का निष्कर्ष इतना ही था कि सामाजिक जीवन का प्राचीन धर्मशास्त्र गलत नहीं था। 
कार्यक्रम के तीसरे सोपान में कवि सम्मेलन का आयोजन किया गया था जिसमें भाग लेने वाले कवि श्री पवन तिवारी जी, श्री कमलेश पांडे तरुण, श्री विनय शर्मा 'दीप' और श्री तेजस सुमा श्याम जी शामिल थे। चारों कवियों की प्रतिभा काव्य विधा के अलग अलग शिखर की ओर श्रोताओं को ले जाने में समर्थ रही। 
अंत में अध्यक्ष ने तीनों कार्यक्रमों को एक सूत्र में सफलतापूर्वक संपन्न होने से संबंधित अपना वक्तव्य दिए। अध्यक्ष श्री सुधाकर मिश्र जीने बेटी से संबंधित भावना पर आधारित कविता सुनाने से खुद को नहीं रोक सके वे अपने अध्यक्षीय वक्तव्य के दौरान अपनी कविता से श्रोताओं को मंत्रमुग्ध कर दिये। 


- योगेश सुदर्शन आर्यवर्ती





तुम जलाना दीप बाती का लोकार्पण संपन्न

वैदिक दर्शन प्रतिष्ठान द्वारा आयोजित पुस्तक विमोचन समारोह में नारायण प्रकाशन वाराणसी से प्रकाशित गीत संग्रह 'तुम जलाना दीप बाती' का लोकार्पण किया गया । कार्यक्रम की अध्यक्षता वरिष्ठ साहित्यकार डॉ. सुधाकर मिश्र ने की जबकि महाराष्ट्र राज्य हिंदी साहित्य अकादमी के कार्याध्यक्ष डॉ. शीतला प्रसाद दुबे बतौर मुख्य अतिथि के रूप में उपस्थित थे । ख्यातिलब्ध युवा समालोचक डॉ. जीतेन्द्र पाण्डेय ने पुस्तक के गीतों को ही पुस्तक-परिचय के रूप में रेखांकित किया । इस क्रम में उन्होंने 'पीर' शीर्षक का एक गीत पढ़ा, "छलक न जाये पीर नयन से / छलकी तो नादानी होगी / रहने दो इसको मन में ही / यह कुछ और सयानी होगी /" अपने अध्यक्षीय भाषण में डॉ. मिश्र ने 'आजादी के परवाने' शीर्षक गीत को बड़े मनोयोग से पढ़ा और इतने सुंदर गीत संग्रह के प्रकाशन पर अपनी खुशी जाहिर की । तीन सत्रों में विभाजित इस समारोह में 'हिंदी के श्रेष्ठ बाल नाटक' का विमोचन भी हुआ । दूसरे सत्र में समाज का आदि संविधान :  मनुस्मृति' पर एक गंभीर चर्चा-परिचर्चा हुई । तीसरे सत्र में युवा कवि पवन तिवारी, कमलेश पाण्डेय 'तरुण', विनय शर्मा 'दीप', डॉ. अभय शुक्ला और तेजस सुमा श्याम ने अपनी बेहतरीन रचनाओं से श्रोताओं को मंत्रमुग्ध कर दिया । कार्यक्रम में विशिष्ट अतिथि के रूप में शिक्षाविद प्राचार्य रामनयन दुबे उपस्थित थे । आकाशवाणी मुंबई के वरिष्ठ उद्घोषक आनंद सिंह, नरेंद्र शास्त्री और सुमन मिश्रा ने कार्यक्रम का कुशल संचालन किया । इस अवसर पर महानगर के सैकड़ों शिक्षक, साहित्यकार, मीडियाकर्मी एवं व्यवसायी उपस्थित थे ।

अम्बेडकर ने मूल मनुस्मृति को स्वीकार किया था - स्वामी यज्ञदेव






    वैदिक दर्शन प्रतिष्ठान द्वारा आयोजित पुस्तक विमोचन समारोह में नारायण प्रकाशन वाराणसी से प्रकाशित गीत संग्रह 'तुम जलाना दीप बाती' का लोकार्पण किया गया । कार्यक्रम की अध्यक्षता वरिष्ठ साहित्यकार डॉ. सुधाकर मिश्र ने की जबकि महाराष्ट्र राज्य हिंदी साहित्य अकादमी के कार्याध्यक्ष डॉ. शीतला प्रसाद दुबे बतौर मुख्य अतिथि के रूप में उपस्थित थे । विशिष्ट अतिथि रामनयन दुबे थे । तीन सत्रों में विभाजित इस समारोह का का दूसरा सत्र "समाज का आदि संविधान : मनुस्मृति" पर था । संदीप आर्य और योगेश मिश्र ने इस पर अपना-अपना  विचार साझा किया । अध्यक्षीय भाषण में पतंजलि योगपीठ हरिद्वार से पधारे स्वामी यज्ञदेव ने कहा, " मनुस्मृति में समाज विरोधी जो भी अंश मिलते हैं वे प्रक्षिप्त हैं । मनुस्मृति की प्रतियाँ इन्हीं प्रक्षिप्त अंशों के कारण जलाई जाती है । बाबासाहेब ने स्वयं मनुस्मृति की मूल प्रति का समर्थन किया था । मनुस्मृति सिर्फ भारत में ही नहीं बल्कि विश्व के कई देशों ने इस पुस्तक के सिद्धांत को अपने यहाँ लागू करवाया है ।" संचालक नरेंद्र शास्त्री जी ने बताया कि यदि किसी को मनुस्मृति से संबंधित कोई भी भ्रम हो तो आर्य समाज में रखी मूल प्रति की जाँच कर सकता है । समारोह का तीसरे सत्र में काव्य संध्या का आयोजन था । युवा कवि पवन तिवारी, कमलेश पाण्डेय 'तरुण', विनय शर्मा 'दीप', डॉ. अभय शुक्ला और तेजस सुमा श्याम की कविताओं का श्रोताओं ने जमकर आनंद उठाया । काव्य संध्या का संचालन सुमन मिश्रा के द्वारा किया गया । इस अवसर पर महानगर की कई प्रमुख हस्तियाँ मौजूद थीं । आभार ज्ञापन डॉ. जीतेन्द्र पाण्डेय ने किया ।





हिंदी के श्रेष्ठ बाल नाटक का विमोचन संपन्न

मुंबई 
वैदिक दर्शन प्रतिष्ठान (रजि) के तत्वावधान में दिनांक 5 जनवरी 2020 शनिवार,आर्य समाज,लिकिंग रोड,सांताक्रूज़ (पश्चिम) मुंबई के सभागृह में परिसंवाद,काव्यसंध्या,पुस्तक विमोचन का समारोह संपन्न हुआ।
कार्यक्रम तीन सत्रों में विभक्त था,प्रथम सत्र में आर. के. पब्लिकेशन, मुम्बई से प्रकाशित पुस्तक "हिन्दी के श्रेष्ठ बाल नाटक" और नारायण प्रकाशन वाराणसी से प्रकाशित "तुम जलाना दीप बाती" का लोकार्पण संपन्न हुआ जिसकी अध्यक्षता वरिष्ठ साहित्यकार डॉ. सुधाकर मिश्र  ने किया । मुख्य अतिथि के रूप में महाराष्ट्र राज्य हिन्दी साहित्य अकादमी के कार्याध्यक्ष डॉ. शीतला प्रसाद दुबे उपस्थित थे । विशिष्ट अतिथि प्राचार्य रामनयन दुबे और प्रमुख वक्ता के रूप में युवा कवि पवन तिवारी मौजूद रहे । अन्य वक्ताओं में गंगाशरण सिंह (समालोचक), शिवम तिवारी, सुमन मिश्रा प्रमुख रूप से विद्यमान थे।प्रथम सत्र का संचालन आनंद सिंह (वरिष्ठ उद्घोषक ,आकाशवाणी मुंबई) ने अपने सुमधुर अंदाज में किया।
लेखकीय वक्तव्य में  डाॅक्टर जितेन्द्र पाण्डेय,अस्लम मुलानी और डाॅक्टर पूजा हेमकुमार अलापुरिया ने पुस्तक की विशेषता पर प्रकाश डालकर अवगत कराया। द्वितीय सत्र में परिसंवाद "समाज का आदि संविधानः मनुस्मृति" विषय पर व्याख्यान,वक्तव्य हुआ,जिसमें मनुस्मृति पर गहराइयों तक जाकर प्रकाश डाला गया।जिसकी अध्यक्षता स्वामी यज्ञदेव (हरिद्वार) ने की मनुस्मृति पर वक्तव्य देने वाले वक्ताओं में संदीप आर्य (मुंबई) और योगेश आर्यावर्ती(मुंबई) थे । संचालन पंडित नरेन्द्र शास्त्री ने किया । तृतीय सत्र में  काव्यसंध्या का आयोजन किया गया ।काव्यगोष्ठी का संचालन सुप्रसिद्ध कवयित्री  शिक्षिका श्रीमती सुमन मिश्रा ने किया ।आमंत्रित कवियों में युवा साहित्यकार पवन तिवारी,वरिष्ठ कवि कमलेश पाण्डेय "तरूण", छंद, सवैया के कवि विनय शर्मा "दीप" ,कवि तेजस सुमा श्याम व डॉ. अभय कुमार शुक्ला ने अपनी-अपनी विधाओं में श्रोताओं को मंत्रमुग्ध कर दिया। समारोह में उपस्थित सभी अतिथियों, कवियों, साहित्यकारों का सम्मान वैदिक दर्शन प्रतिष्ठान के पदाधिकारियों द्वारा अंग वस्त्र, स्मृतिचिह्न व पुष्पगुच्छ देकर सम्मान किया गया। अंत में डॉ. जितेन्द्र पाण्डेय ने उपस्थित सभी अतिथियों, साहित्यकारों,पत्रकारों व श्रोताओं को अपना अमूल्य समय प्रदान करने हेतु धन्यवाद देते हुए आभार प्रकट किया ।


Wednesday, December 25, 2019

जागते रहो !





“चौकीदार चाचा नमस्ते, कैसे हो?”

“अरे, बिटिया कब आए ससुराल से ? (थोड़ा रुक कर) सब बढ़िया है तुम्हारे परिवार में ?”

“हां चाचा सब बढ़िया है I आप सुनाओ I चाची कैसी है ?” 

बिटिया तुम इतने सालों में आती हो, खैर खबर ही नहीं तुम्हें I

“क्यों चाचा ऐसा क्यों बोल रहे हो आप ? चाची तो ठीक है ना ?”

“तीन  सालों से तुम्हारी चाची ने खाट पकड़ ली हैI उसे उठाने-बैठाने के लिए भी एक इंसान चाहिए I मैं ठहरा बूढ़ा I अब इस शरीर में इतनी जान नहीं बची है, बस राम भरोसे ही गाड़ी खिंच रही हैI

“चाचा आज ही आई हूँI एक दिन चाची से मिलने आती हूँ I

आपका बेटा शंकर है ना I क्या वह चाची का ख्याल नहीं रखता I अब तो काफी बड़ा हो गया होगा I उसकी शादी हुई या नहीं I

“हाँ बिटिया बेटा भी है और बहू भी I
 मगर दोनों ही बेकारI दोनों हमारे किसी काम के नहींI बहू को तो हम दोनों बुड्ढा - बुड्ढी बिल्कुल नहीं सुहाते हैंI बेटे को भी बहू की बातें सुनाई देती हैI छोड़ो बेटा यह तो कर्मों का फल है जैसा बोया होगा, आज वैसा ही काट रहे हैंI

“चाचा मुझे आज भी याद है आप अपना कर्तव्य पूरी निष्ठा और ईमानदारी से निभाया करते थे I और आज भी...I आपके स्वभाव और अपनेपन में भी कोई कमी नहीं आई हैI

“चाचा जब हम इस शहर में रहने आए थे, तब आधी रात को पहली बार आपकी आवाज सुनकर मैं काँप गई थी I कई दिनों तक ज्वर से पीड़ित रही I रात होते ही भय मुझे जकड़ लेता कि अभी खूंखार, भयावह और विशालकाय वाला कोई आएगा I फिर जोर-जोर से बजती सीटियों के साथ “जागते रहो! जागते रहो!” की आवाज मेरे कानों को चीरती I मेरे हृदय तल पर एक कौंध-सी उभर गई थीI रह-रह कर मन में ही बात आती कि एक दिन यह व्यक्ति मुझे चुरा कर ले जाएगा I

अच्छा बिटिया! मुझे तो पता ही नहीं I बिटिया तुम्हारे हृदय से मेरी भयावहता का भय कैसे निकला?”

दोनों खिलखिला कर हँसते हैं I हँसते हुए बिटिया कहती है, “चाचा आज मुझे हँसी आ रही है मगर उन दिनों तो मेरी स्थिति बहुत भयावह थी।”

“बिटिया हँसो, मगर बता तो दो…...I
“हाँ-हाँ, चाचा बताती हूँ I मम्मी-पापा ने खूब समझाया, मगर मैं मानने के लिए तैयार ना थीI अरे! चाचा खड़े क्यों हो ? अंदर आ जाइए I क्या सारा किस्सा यहीं देहरी पर ही सुनोगे I
नहीं-नहीं बिटिया I मैं यही ठीक हूँ...I
“अरे चाचा कैसी जिद करते हैं आप I अंदर आ जाइए।”
“नहीं बिटियाI यहीं देहरी पर बैठ जाता हूँI अब तुम बताओ फिर क्या हुआ ?”
“हाँ चाचा बताती हूँ I मुझे आज भी याद है कि किस तरह से आपका परिचय हुआ था I मैं उस दिन को कभी नहीं भूल सकती I

“क्यों बेटा ? ऐसा क्या हुआ था जो मेरे परिचय का दिन तुम्हारी स्मृति में आज भी समाया हुआ है।”

जी चाचा I रात की चौकीदारी के उपरांत अगली सुबह आप अपनी तनख्वाह लेने घर-घर दस्तक दे रहे थे I पापा घर पर ही थे I मैं और पापा छत पर रखे पौधों पर पानी छिड़क रहे थे I तभी आपने पड़ोस वाले ताऊजी के घर का कुंडा खटखटाया I काफी देर तक दरवाजा खटखटाने पर भी भीतर से कोई प्रतिक्रिया न दीखाई दी I आपने एक बार और प्रयास किया शायद कोई दरवाजा खोल दे I मगर..I आप निराश हो हमारे घर की ओर कदम बढ़ा ही रहे थे कि ताऊ जी के बड़े बेटे ने दरवाजा खोला I दरवाजा खुलते ही आपके चेहरे पर उम्मीद की एक लहर दौड़ पड़ी I आप मुस्कुराते हुए मुड़े ही थे कि तभी संजीव भैया भर्राते स्वर में आप पर बरस पडे क्यों भई अँधा–बहरा है क्या तू ? समझ नहीं आता क्या ? जब एक बार में दरवाजा नहीं खोला तो उसे पीटने की क्या जरूरत है I (संजीव चौकीदार से कहता है )
साब जी मैं तो.I
क्या मैं तो ?
साब जी मैं तो अपने पैसे लेने आया था।
अरे! कैसे पैसे ? क्या हमने तुमसे लिए हैं ? या तू देकर भूल गया हैI
नहीं साब जीI मैं तो रात की चौकीदारी के पैसे मांग रहा थाI
कैसी चौकीदारी I तुम सबके सब निठल्ले होI रात को मुहल्ले में जो चोरियाँ होती है उसमें तुम लोगों का ही हाथ होता है I चौकीदारी के नाम पर रात को चोरियाँ करवाते हो तुम I आज तो आ गया है फिर से दिखाई न देना यहाँ I चोर कहीं केI
साब जी गाली मत दो I हम पूरी इमानदारी से चौकीदारी करते हैं I
हाँ, हाँ, हमें पता है कि तुम कितनी इमानदारी से..I
साब जी मेरा मेहनताना दे दो I
मेरे घर से तुम्हें कुछ नहीं मिलेगाI अपना रास्ता नापों...I
संजीव भैया ने न जाने क्या-क्या आरोप आप पर थोपने शुरू कर दिए I आप बड़ी शालीनता और धैर्य बांधे चुपचाप खड़े रहे I संजीव भैया के ऊँचे और कटु स्वर ने पूरे मुहल्ले को इकट्ठा कर लिया।
पापा ने छत के छज्जे से जो दृष्टि गली में फेरी तो देखा पूरा मुहल्ला एकत्रित हो चुका है I पापा मुझे साथ लेकर गली की ओर दौड़े I एक निर्दोष और इमानदार के साथ कैसी नाइंसाफी की जा रही है और सब तमाशा देख रहे हैं I क्या हुआ संजीव? पापा ने भैया से पूछा I
चाचा जी देखो कैसी धौंस जता रहा है, ये दो टके का चौकीदार I एक तरफ कामचोरी करते हैं और दूसरी तरफ पैसे मांग रहा है I
हाँ संजीव तुम ठीक कह रहे हो I
पापा की बात सुन संजीव की ख़ुशी का ठिकाना न रहा I मगर आप (चौकीदार) की निराशा स्पष्ट झलक रही थी I वहाँ उमड़ी भीड़ भी यही सोचने लगी की संजीव अब तक जो कह रहा था सब ठीक था I लोगों के चेहरे पर भी चमक सी आ गई I मैं चुपचाप सब सुन और देख रही थी संजीव एक बात बताओ हमारे मुहल्ले में अब तक कितनी चोरियाँ हुई है ?
एक भी नहीं चाचाजी I
कभी कोई हत्या या खून खराबे की बारदात हुई है क्या ?
नहीं चाचाजीI
आधी रात को किसी के घर में घुसने की कोई घटना ?
नहीं चाचा I
देर रात को लौटते समय तुम्हारे या परिवार के साथ कोई छेड़-छाड़, बदतमीजी, झडप, लूटपाट आदि ऐसा कुछ हुआ क्या?
नहीं चाचाजी I
ऐसी कोई रात जब तुम्हारा परिवार असामाजिक तत्वों की चिंता के कारण ठीक से सो न पाया हो ?
नहीं चाचाजी I ऐसा कभी नहीं हुआ।
अच्छा एक बात और बताओ I
हाँ, पूछिए न चाचा जी I
तुम्हें हर महीने ऑफिस से कितनी छुट्टियाँ मिलती है ?
यही कोई चार I मगर चाचा मैं आपकी बात समझा नहीं I और इन सब बातों से इस बहादुर का क्या मतलब ?
संजीव मतलब है I बहादुर पूरा साल एक भी दिन नागा किए बिना ही अपनी जिम्मेदारी और कर्तव्य को पूरी शिद्दत से निभाता है I कभी किसी से ज्यादा पैसा नहीं मांगता I जो कोई अपनी ख़ुशी से जो दे देता है, बेचारा चुपचाप ले लेता है I तुमने इस निर्दोष पर बिना सोचे समझे न जाने कैसे-कैसे आरोप लगा दिए I अपने प्राणों की परवाह किए बिना पूरी रात निष्कपट भाव से हमारी रखवाली करता है I संजीव अभी तुमने ही कहा हमारे मुहल्ले में कभी भी ऐसा कुछ भी नहीं हुआ जिसके लिए बहादुर को दोषी ठहराया जाए I इनको भी इज्जत प्यारी होती है I ये भी आत्मसम्मान की भावना रखते है I गरीब जरूर है, मगर सबसे पहले ये हमारी-तुम्हारी तरह ही इनसान है I पापा की बात सुन सभी के चेहरे फीके से पड़ गए I
चाचाजी, मुझे माफ़ कर दो I मैं बिना वजह ही बहादुर पर चढ़ गया I संजीव ने अपनी जेब से पैसे निकाले और बहादुर को थमाते हुए क्षमा मांगी I
“बिटिया तुम्हें तो सब याद है I मैं तो कब का भूल चुका था इस घटना को I
“चाचा यही तो खासियत है आपकी I
बस फिर क्या था पापा ने घर आकर मुझे बताया कि आप वही हैं जो रात भर जाग कर हमारी रक्षा करते है और जोर-जोर से सीटी बजाकर कहते हैं “जागते रहो ! (दोनों खिलखिला कर हँस पड़े।)

मनुष्यता - मैथिलीशरण गुप्त

    मनुष्यता                                               -  मैथिलीशरण गुप्त  विचार लो कि मर्त्य हो न मृत्यु से डरो कभी¸ मरो परन्तु यों मरो...