Thursday, November 7, 2019

चैताली


 
 
      तेरह साल की अबोध बालिका स्कूल से घर की ओर बड़े ही चहकते हुए अंदाज में, उछलते–कूदते सहेलियों संग आ रही थी I जैसे ही घर पहुँची तो देखा, बाबा आँगन में बैठे कुछ अजनबी लोगों से बतिया रहे थे I उम्र भले ही तेरह की थी, मगर कद-काठी कुछ ऐसी कि देखने पर ऐसा प्रतीत होता १५-१६ की होगी I गोरी चिट्टी, आँखें बड़ी और भूरी हिरनी सी कुछ विस्मित करने वाली I सीधे कंधे पर लटका बस्ता, अधखुले से बाल, एक चोटी अपनी जगह सही सलामत झूल रही थी और दूसरे के रिब्बन का कुछ अता- पता ही नहीं I अंदर घुसते ही उसने आव देखा न ताव सीधा बाबा से जा लिपटी और अपने बस्ते से स्कूल से मिली अपनी क्लास फोटो दिखने लगी I चैताली अभी तुम अंदर जाओ में बाद में तुम्हारी फोटो देखूँगा I
    ( कुछ लड़ाते हुए ) नहीं, आप अभी देखो I चैताली अभी घर पर मेहमान आए है I हम आराम से बात करेंगे I
बाबा पहले पक्का वादा करो I तभी अंदर जाऊँगी I माँ किधर है ? नजर ही नहीं आ रही है I
   “चैताली ........I” चैताली के बाबा कुछ नाराजगी जताते हुए कहते हैं I
ठीक है; जाती हूँ I (चैताली अंदर चली जाती है I)
   (घर पर आए अपरिचित में से एक व्यक्ति कहता है I ) काफी छोटी है आपकी बेटी चौधरी साब I बचपना तो खूब भरा है I कैसे घर – गृहस्थी संभालेगी तुम्हारी बेटी ?
   “तुम चिंता न करो सरकार I घर-गृहस्थी की जिम्मेदारी पड़ने पर छोरी सब सीख जाती है I अब अपनी–अपनी घरवालियों को ही देख लो I जब ब्याह के आई थीं वे कौन-सी ज्यादा बड़ी थीं; मगर समय और जिम्मेदारियों ने सब सिखा दिया I” चैताली के बाबा बनती बात बिगड़ न जाए इसलिए बात को सँभालते हुए कहते हैं I
   चैताली की माँ कुछ जरा चाय तो भिजवाना I कितना समय लग रहा है I (आँगन से बैठे-बैठे कुछ ऊँची आवाज में कहता है I) सरकार आपने छोरी देख ली I हमारा घर परिवार भी देख लिया I जब तक जलपान आ रहा है तब तक आगे की बात कर लेते हैं I
   चौधरी साब अगर रिश्ता पक्का हो गया तो ये न समझना कि तुम्हारी छोरी को पढ़ने- लिखने मिल जावेगा I आपने जितना पढ़ाया वही ज्यादा हो गया है I हमसे उम्मीद न करना ....I थोड़ा-सा पढ़ने–लिखने पर आजकल की छोरियों के नखरे घने हो जाते हैं I बात-बात पर अपने पढ़ने का रॉब झाड़ती फिरें हैं I गर तुम्हारी छोरी ने जरा भी मीन-मेक की तो अगले ही दिन तुम्हारी छोरी वापस आ जाएगी I
    न-न सरकार आपको कभी शिकायत का मौका न मिलेगा I म्हारी छोरी घनी समझदार सै I
चौधरी वो तो दीख रा सै I कितनी समझदार है I ....वो तो झोटरमल साब जी ने रिश्ता बताया है तो छोरी देखने चले आए I वैसे म्हारे छोरे ने छोरियों की कमी न सै I म्हारा छोरा कालेज में पढ़ावे सै I घनी तनख्वाह है उसकी I उसने ...
  चैताली की माँ सबके लिए चाय, नाश्ता लाती है I
चाय की चुस्कियाँ लेते हुए बातें आगे बढ़ती हैं I
  उधर चैताली अपनी सहेलियों संग छत पर हँसी-ठिठोलियाँ कर रही थी I इस दुनिया के तौर तरीकों, रस्मों-रिवाजों और सब बातों से अनजान चैताली अपनी ही दुनिया में मशगुल थी I उसके सपने, उसकी भावनाएं, उसका उत्साह जो वह अक्सर खुली आँखों से देखा करती थी I अपनी दुनिया का स्केच वह खुद बना, उसे रंगों से भरने का प्रयास करती I
   आँगन में चैताली के हाथ पीले होने की बातें तह की जा रही थी, उधर चैताली अपनी सहेलियों से अपने जीवन के रंगीन सपनों को बयाँ कर रही थी I आशा तुझे पता है मैं खूब पढ़ना चाहती हूँ I तू देखना मैं खूब पढूँगी I अपने माँ-बाबा का खूब नाम रोशन करुँगी I एक दिन तुम सब मुझ पर गर्व करोगी I हमारे गाँव के स्कूल में एक भी मास्टरनी नहीं है I तुम देखना जब मैं पढ़ लिख जाऊँगी तो अपने ही गाँव के स्कूल की लड़कियों को पढ़ाऊँगी I तब किसी के माँ-बाबा को चिंता न रहेगी कि छोरी स्कूल में मास्टर साहब से कैसे पढ़ेंगी ....I
   चैताली... बड़े – बड़े सपने देखने बंद कर दे I हमारी ऐसी किस्मत कहाँ कि हम खूब पढ़े और अपने मन मुताबिक जी सके...  जिस दिन बाबा को कोई अच्छा परिवार और लड़का मिल जाएगा उसी दिन हाथ पीले कर देंगे I
   “आशा तुम ठीक कह रही हो I हमें तो अपना अच्छा बुरा सोचने और कहने का भी हक़ नही है I माँ हमारे लिए कुछ सोचना भी चाहेगी तो ये समाज उसे जीने नहीं देगा ...I” कुछ रुआँसी सी हो मंजरी कहती है I
   “मंजरी तुम्हे याद है अपनी रेशमा ...I” आशा कहती है 
  हाँ ! हाँ ! बहुत अच्छे से याद है I कितने सपने थे उसकी आँखों में I चैताली की तरह I मगर हुआ क्या ? हम सभी जानते हैं I उसके बापू ने एक अधेड़ से उसका ब्याह करा उसकी जिंदगी दाव पर लगा दी I कहाँ वह मासूम सी 12 साल की लड़की कहाँ वह बुढाऊ ...I कैसे बर्दाश्त किया होगा उसने ? पता नहीं कैसी होगी वह ? रेशमा की खुशियाँ अपनों ने ही निगल लिया I कभी कभी लगता है क्या वाकई में ये हमारे जन्मदाता हैं? हम इन्हीं की संतान है हैं ? समाज की की बातों में अपनी ही फूल सी बच्ची का जीवन चूल्हे की दहकती चिंगारी में झोंक देते हैं I
   तुम दोनों ठीक कह रही हो I मुझे भी रेशमा की याद आती है I जब से उसकी शादी हुई है तब से एकबार भी लौटकर नहीं आई I हर साल अपने गाँव में रेशमा जैसी न जाने कितनी ही लडकियाँ परिवार और समाज के नियमों के मकड़ जाल का शिकार हो जाती हैं I      कोई कुछ नहीं कहता I बस बुत बन तमाशा देखते हैं I समाज के नाम पर बेबुनियादी नियमों, परम्पराओं, संस्कार आदि का चोला पहन तमाशबीन बनाने के अतिरिक्त आता ही क्या है I खेलने कूदने की उम्र में चूल्हा-चौका, पति, नाते-रिश्ते न जाने किन-किन जिम्मेदारियों में उलझा कर रख दिया जाता है I परिपक्व होने से पूर्व ही पंख कतर दिये जाते है I  न अपने मन से हँस सकते हैं और न रो ही ...I तुम देखना आशा और मंजरी मैं अपने साथ ऐसा न होने दूँगी I मैं तो खूब पढूंगी I मैंने तो बाबा से कह दिया है मैं न करूँगी शादी-वादी I
   “चैताली तुम बुरा न मनो तो कुछ कहूँ I” आशा कहती है I
   हाँ, कहो न I भला मैं तुम्हारी बात का बुरा क्यों मानूँगी I तुम दोनों ही हो जो मेरी बातों को सुनते हो और समझते हो I बाकी सब तो मुझे पागल ही समझते है I टेड़ा-सा मुँह बना के कहते है, “छोरी हो I क्या करोगी पढ़ – लिख कर I न बन रही कोई कलेक्टर - वलेक्टर....I अच्छा कहो क्या कह रही थीं I
   मैंने काल अपनी माँ और बाबा को बात करते हुए सुना था कि आज तुम्हारे घर कुछ मेहमान आ रहे है जो तुम्हें देखने आने वाले है I तुम्हारे बाबा तुम्हारी शादी की बात तय कर चुके है I अगर तुम उन्हें पसंद आ गई तो 2-3 महीने में तुम्हारे हाथ पीले कर सदा के लिए विदा कर दिया जाएगा I तुम्हारे घर के आँगन में जो लोग .....I
   “आशा तुमने गलत सुना होगा I शादी और मेरी I नहीं- नहीं I बाबा मेरी शादी इतनी जल्दी नहीं करेंगे I” पूरे आत्मविश्वास के साथ चैताली अपनी दोनों सहेलियों से कहती है I
   चैताली तुम मानो या न मानो I अब तुम्हारी मर्जी I मगर ऐसा ही ....I तुम भी शायद थोड़े दिनों बाद हमसे काफी दूर चली जाओगी I आज रेशमा को याद कर आँखें नम हुई चली जा रही है I पता नहीं; हम फिर कभी यूँ एक साथ .... I
  नहीं ऐसा नहीं होगा I मैं अभी बाबा से पूछती हूँ I तुम यहीं रुको I मैं अभी आती हूँ I
( मंजरी चैताली का हाथ पकड़ उसे रोकती है I )
   चैताली रुको I आशा ठीक कह रही है I तुम्हारा सबके सामने ऐसे जाना और अपने बाबा से कुछ भी पूछना उचित नहीं है I तुम अपने बाबा से अभी नहीं बाद में ....I
( चैताली कुछ रुष्ट स्वर में ) तुम दोनों को आखिर क्या हो गया है I आज अचानक कैसी बातें कर रहे हो तुम दोनों ? सब कुछ मेरी समझ से परे है I मेरे बाबा, ऐसा नहीं करेंगे I मैं अपने बाबा को बहुत अच्छे से जानती हूँ I वो अपनी चैतू से बहुत प्यार करते है I वो मुझे अपने से दूर नहीं जाने देंगे I ये लोग तो बाबा के कोई परिचित दोस्तों में से होंगे I वैसे भी बाबा से कोई न कोई मिलने आता ही रहता है I ये लोग भी यूँ ही चले आए होंगे I इन लोगों को एक बार चले जाने दो फिर सब साफ हो जाएगा I
(  इधर चौधरी साहब और हीरामल एक दूसरे के गले लग रिश्ता तय होने की मुबारकबाद दे रहे थे I )
   “हीरामल जी आप पंडित जी से अच्छा–सा मुहूर्त निकलवा लीजिए I फिर हम भी शादी की तैयारी में लगे I” चैताली का पिता कहता है I
 तुम चिंता ना करो I पंडित का क्या, वो सब तो हम देख ही लेंगे I
शादी की बात सुन चैताली के पैरों तले जमीन ही सरक गई I खूब मिन्नत की, हाथ पैर-जोड़े मगर चैताली के पिता का दिल ना पसीजा I माँ-बाबा के इस रूप को देख चैताली पूरी तरह टूट गई I अब न दिल में कोई अरमान था, न कोई जज़बा बनने का...I अपने कुचलते सपनों की धरा पर सिर्फ चलता फिरता पुतला थी I
   शादी का दिन भी आ गया I चैताली की हथेलियाँ मेहँदी से रची गई I हल्दी चढ़ी I बन्नी गाई गई I बारात का भी खूब धूमधाम से स्वागत हुआ I चैताली की डोली भी विदा हो गई I  आशा और मंजरी द्रवित और स्तब्ध आँखों से चौखट पर खड़े हो चैताली की डोली ओझल होने तक निहारती रहीं I
   बिहाता चैताली के इस जीवन सूची में सास- ससुर, पति के अतिरिक्त दादी सास, चार ननद और दो देवर भी है I सास और ननद की जुवान कुछ पतली थी I कुछ कहने और सुनाने का मौका न छोड़ती I
   नन्हें नन्हें कोमल हाथों में दस–बारह लोगों की जिम्मेदारियों की डोर I कितनी बार  तो वह समझ ही न पाती कि क्या करूं और कैसे करूँ ? ऊपर से सास ननद का फिराक्त में रहना की चैताली कोई गलती करे और वे उस पर बरस जाए I फूंक-फूंक कर कदम बढाती और राम-राम का नाम ले दिन काटती I पति पारस दूसरे शहर में नौकरी पेशा होने के कारण 15-20 दिनों में एक बार आया करता था I पारस के आने पर चैताली से बढ़ा प्रेमपूर्वक व्यवहार किया जाता I
   चैताली हर बार पारस के आने पर अपने मायके जाने की बात करती मगर माँ-बाबा की सहमती के बिना भेजना उसके लिए मुमकिन न था I
   चैताली के हर बार मायके जाने वाली बात उसे कुछ खटकने लगी I कहीं मेरे घर में चैताली दुखी तो नहीं है I या उसके man में कोई और इच्छा तो नहीं I पारस ने चैताली के मन की बात जानने की कोशिश की I पहले तो वह एक ही बात पर अटकी रही मगर पारस के नम्र और सहृदय स्वभाव में चैताली का मन जीत लिया I चैताली ने जो बोलना शुरू किया बस अपनी बात पूरी करने पर ही रुकी I पारस उसकी मासूमियत और भोलेपण को निहार रहा था कि उसकी पत्नी अबोध बालिका ही है I भले ही रस्मों-रिवाजों ने उन दोनों को परिणय सूत्र में बाँध दिया हो मगर वह आज भी निरी बच्ची ही है I
   पारस चैताली से करता है कि वह उसे मायके भेजने में असमर्थ है मगर उसे अपने साथ शहर ले जाने का बंदोबस्त कर सकता है I
   चैताली पारस की बातों से प्रभावित हो गई I सारी रात हृदय के धरातल पर नई उम्मीद और नव स्वप्न को बुनते – बुनते कब सुबह हो गई चैताली को पता ही नहीं चला I
   अगली सुबह पारस ने चैताली को अपने साथ शहर ले जाने का प्रस्ताव बाबा के सामने रखा I बाबा ने बेटे की तकलीफ समझते हुए हाँ कह दिया मगर माँ और बहनों ने तांडव मचा दिया I यह चली जाएगी तो घर के कम कौन करेगा ? इसी ने साथ जाने की जिद्द की होगी I वरना हमारे बेटे को क्या पता .....I
   पारस माँ को समझता है उसने कुछ नहीं कहा I न ही मैं उसका पक्ष ले रहा हूँ तकलीफ यह है कि मुझे ऑफिस जाने से पहले और आने के बाद खाना पकाना, अपने कपडे धोना सब खुद ही करना पड़ता है I ये रहेगी तो मुझे जरा आराम मिल जाएगा I  पारस ने जैसे तैसे सबको मना लिया I
   अब क्या था, चैताली के सपनों को पंख मिल गए I पारस ने चैताली का नौवीं में दाखिला करवा दिया I शुरू में उसे कुछ अटपटा लगा मगर पारस के विश्वास ने उसका हौसला बढ़ा दिया I चैताली भी मन लगा कर पढ़ने लगी I शाम को पारस के आने से पहले ही घर-गृहस्थी का काम ख़त्म कर लेती I ताकि शाम को पारस पढाई में उसकी मदद करे I घर से लाख बुलावा आने पर भी पारस कोई न कोई बहाना बना देता I अब समय था चैताली की परीक्षा का I खूब मन लगा कर मेहनत की उसने I पारस चैताली का रिजल्ट देख भौंचक्का रह गया I चैताली पूरी क्लास में प्रथम आई थी सभी शिक्षक भी खुश थे उसके रिजल्ट से I
   पारस चैताली के दोनों हाथ अपने हाथों में ले कहता है कि चैताली आज मैं बहुत खुश हूँ I तुम जितना पढना चाहती हो पढों, जो करना चाहती हो करों मैं कभी भी तुम्हारा हाथ नहीं रोकूंगा I अपने पंखों को थकने मत देना I
   चैताली ने जो रफ्तार पकड़ी बस फिर रुकने का नाम न लिया I इस सफर में पारस और चैताली की संतान के रूप में तीन बेटियाँ ने भी पदार्पण किया I बेटियों के जन्म पर सास ननद ने नाक-मुँह सिकोड़ा मगर किसी की चिंता किए बिना वह आगे बढ़ती रही I घर-गृहस्थी की उधेड़-बुन, बेटियों की परवरिश और अपनी तालीम में कोई कमी न आने दी I
   चैताली ने आठ विषयों में एम.ए.  की उपाधि के अतिरिक्त बी.एड., पीएच. डी. की भी उपाधि ग्रहण की I अपने शैक्षणिक बल और सूझबूझ हेतु वह जूनियर कॉलेज में सरकारी नौकरी में सहायक शिक्षिका पद पर कार्यरत है I चैताली को उसकी दक्षता और कुशलता के लिए श्रेष्ठ शिक्षिका राज्य स्तर पुरस्कार से सम्मानित किया गया I विभिन्न सामाजिक, शैक्षणिक, धार्मिक आदि कार्यों से जुड़ी है I अनेकों पुरस्कारों से सम्मानित, ऐसी है चैताली I बचपन में देखे स्वप्न को पूरा करने की ललक ने आज उसे उसके मुकाम पर पहुंचा दिया है I मात्र माता-पिता का ही नहीं बल्कि सास ससुर का भी नाम समाज में ऊँचा कर दिया I पति की अगवाही ने चैताली के जीवन की परिभाषा ही बदल दी I चैताली की बुलंदियों पर उसका पूरा गाँव गर्व करता है तथा गाँव की हर लड़की के लिए वह जीता जगता आदर्श बन गई है I
   यदि जीवन में कुछ पाने की चाह उत्कृष्ट हो तो मंजिल पाना मुश्किल नहीं है I
       
   

Tuesday, November 5, 2019

माँ से कहो कि आश्रम ...!




-    डॉ. पूजा हेमकुमार अलापुरिया

   मुकुंद आज आने में काफी देर हो गई।
हाँ ! बस थोड़ा-सा काम आ गया तो यही सोचा कंप्लीट करने पर ही निकलूं।
  नीरू किचन की ओर बढ़ते हुए, "मुकुंद जल्दी फ्रेश हो जाओ मैं खाना लगाती हूँ।"
तुम खाना लगाओ नीरू बस मैं यूँ गया और यूँ आया।
खाना परोसते हुए नीरू कुछ कहना चाह रही थी, मगर हिम्मत न जुटा पा
      खाने की मेज पर खाना खाते हुए मुकुंद कहता है, “नीरू आज तुम्हारा फिस का दिन कैसा रहा ?”
      अच्छा था। आज लंच में निहारिका मिली थी। तुम्हारे बारे में पूछ रही थी। आजकल लंदन में है। किसी फिस मीटिंग के सिलसिले में आई है। दो दिन बाद रिटर्न जा रही है।  
      अच्छा ! संडे लंच पर बुला लेती उसे‌। काफी समय से गेट-टुगेदर नहीं हुआ है। इसी बहाने मिलना हो जाता। रोहन भी आया है क्या ?
      हाँ रोहन भी आया है I काफी बिजी हैं वो। मुश्किल है आना। देखती हूँ। एक बार बात करती हूँ कल । दोनों को एक बहुत बड़ा प्रोजेक्ट मिला है I
अच्छा ! कैसा प्रोजेक्ट ?
      विभिन्न संस्थाओं द्वारा चलाए जाने वाले अभियान ‘भारत में कुपोषित बाल एवं उनके निदान हेतु उठाए जाने वाले कदम’ का विश्लेषण कर रिपोर्ट तैयार करनी है I टेबल से सामान समेटते हुए नीरू हिम्मत कर मुकुंद से कहती है, "मुकुंद क्या तुमने माँ से बात की?"
      नीरू समय ही नहीं मिला। तुम खुद ही बताओ मैं माँ से कैसे बात करूं? कैसे आश्रम की बात...।
      मुकुंद इसमें गलत भी क्या है? मुझे लगता है तुम्हें बिना संकोच के माँ से बात करनी चाहिए। मैं उनके भले की ही बात कर रही हूँ

नीरू मुझे लगता है वो जैसे जीना चाहती है उन्हें जीने दो। इस उम्र में अब ये ...।

मुकुंद तुम समझना क्यों नहीं चाहते।

नीरू माँ ने जीवन में बहुत कुछ झेला है अब इस तरह का वाकया वह सुन न सकेगी।
मैं तुम्हारी माँ की कोई दुश्मन नहीं हूँ। मैं उनके भले की ही बात कर रही हूं।

नीरू मैं काफी क गया हूँ इस विषय में कल बात करेंगे।

अगली सुबह, "गुड मॉर्निंग मम्मी जी। कैसी हो ?"
      "गुड मॉर्निंग नीरू । मैं अच्छी हूँ I कल रात बहुत दिनों बाद बहुत अच्छी नींद आई I नीरू आज फिस नहीं है क्या?
      मम्मी जी फिस तो है मगर मैंने आज छुट्टी ली है। आज मैं पूरा दिन आपके साथ बिताना चाहती हूँ
      ये तो बहुत अच्छी बात है। तुम बैठो नीरू। मैं तुम्हारे लिए नाश्ता बनाती हूँ
नहीं मम्मी जी आज हम दोनों एक साथ नाश्ता करेंगे। फिर शॉपिंग के लिए जाएँगे। 
      नीता बहू का प्यार और अपनापन देख अपने भाग्य एवं पूर्व कर्मों के लिए ईश्वर का शुक्रिया अदा कर रही थी। नीरू को ससुराल आए अभी एक साल भी नहीं हुआ है। लेकिन घर में पूरी तरह रच-बस गई है।

      नीता और नीरू दोनों तैयार हुए और निकल पड़े शॉपिंग के लिए। घर लौटने से पहले नीता ने ड्राईवर को गाड़ी आश्रम की ओर लेने के लिए कहा। आश्रम का नाम सुनते ही नीता के हाथ-पैर फूलने लगे। मन में भय जागृत होने लगा। कहीं नीरू ने अपनी चिपडी- चिपडी बातों में फंसा मुझे आश्रम में ....। मगर नीता धैर्य का बांध बांधे बैठी रही।

      ड्राईवर ने गाड़ी रोकी। नीरू और नीता गाड़ी से उतरे। सामने बड़ा-सा आश्रम था‌। नीता का मन अभी भी उथल-पुथल कर रहा था।
      माँ इस आश्रम से मेरी बहुत सारी यादें जुड़ी है। जब मैं छोटी थी तब अक्सर दादी यहाँ लाया करती थी। आश्रम के बच्चों और महिलाओं से बात करना, उनके लिए कुछ करना मुझे बहुत अच्छा लगता है। हमारे यहाँ आने से इन्हें एक नई जिंदगी, उम्मीद, विश्वास, अपनेपन का अहसास, कल्पना की नव उड़ान मिलती है । जब कभी मन बेचैन और उदास होता है, तो मैं यहीं चली आती हूँ । मन को बड़ा सुकून मिलता है। माँ देखो इन छोटे-छोटे बच्चों को कैसे उम्मीद की नजरें गड़ाए बैठे हैं ?
      मैं और मुकुंद दोनों फिस के कामों में इतना व्यस्त रहते हैं कि आपको समय ही नहीं दे पाते । और रही बात घर के काम-काज की तो उनके लिए नौकर काफी हैं आपके आशीर्वाद और भगवान की दुआ से मैं और मुकुंद दोनों इतना कमाते हैं कि आपको कभी भी किसी भी चीज़ की कमी न होने देंगे I आपको पलको पर बैठा कर रखना चाहते हैं हम I
  मुझे बहुत बुरा लगता है कि आपके अकेलेपन को दूर करने में हम दोनों असमर्थ हैं। आप अक्सर टीवी देख कर समय बिताने की कोशिश करती हैं। जब टीवी से मन ऊब जाता है तो सोसायटी की हमउम्र औरतों के साथ जी बहलाने का प्रयास करती हो।

 माँ अगर आप बुरा न मानें तो एक बात कहूँ

"कहो न नीरू।" नीता कहती है I
      सोसायटी की सभी वृद्ध महिलाएँ इधर-उधर की बातें करती हैं या फिर सास-बहू वाले किस्सों के चटकारे मारती है। अच्छी खासी बहू बदनाम हो जाती है। आखिर उनकी बहुएँ भी किसी की बेटी हैं I आप मुझे अपनी बेटी से ज्यादा प्यार करती हैं I तो क्यों किसी की निंदा सुनने के पात्र बने I इश्वर ने हमे जो जीवन दिया है उसका सदुपयोग करें I
      माँ अगर आप अपना खाली समय यहाँ आ कर बिताएँगी तो इन्हें कोई अपना मिल जाएगा और आपका समय भी बीत जाएगा। आपके यहाँ आने से किसी को माँ का स्नेह, तो किसी को दादी का दुलार तो ...। आप तो पढ़ी-लिखी हैं I कंप्यूटर का भी अच्छी नॉलेज भी है I यहाँ के बच्चों को पढ़ने-लिखने मदद कर सकती हैं I कंप्यूटर की छोटी-छोटी जानकारी दे सकती हैं I
      जब कभी आपको आना होगा, तो ड्राईवर आपको छोड़ जाया करेगा। आपके मन को शांति-सुकून मिलेगा। माँ मेरी बातों का बुरा न मानना। मैंने मुकुंद से इस विषय में आपसे बात करने के लिए कहा था मगर वह संकोचवश कुछ कह न सका।
      नीरू कल रात मैंने तुम्हें मुकुंद से बात करते हुए सुना था। तुम्हारी आधी-अधूरी बात से मैं कांप गई थी कि मेरे बेटे-बहू मुझे आश्रम भेजना चाहते हैं।  मगर आज तुम्हारी बात सुन सीना गर्व से चौड़ा हो गया। मुझे बहू के रूप में साक्षात बेटी मिली है। जो मेरी खुद से भी ज्यादा चिंता और प्रेम करती है I जो बात मुझसे मेरा बेटा न कह सका, वही तुमने कितने सहज और सरल शब्दों में बयाँ कर दी
      थैंक्स नीरू। वैसे भी घर में पड़े – पड़े मैं ऊब जाती हूँ I मैंने कभी नहीं सोचा था कि उम्र के इस पड़ाव को इतनी सुकुंत के साथ जिया जा सकता है I अपने दुखों को भूल हम किसी कि ख़ुशी का हिस्सा बन सकते हैं यह विचार कभी हृदय में आया ही नहीं I हमारी एक मुस्कान किसी के जीवन में रंग भर सकती है, इस बात का आभास आज हुआ I नीरू तुमने जीवन के इस पड़ाव पर मुझे जीने की नई राह दिखाई। (दोनों आपस में गले मिलती हैं I)

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emotions






वक्त अपनो को अजनबी बना रहा है 
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बड़े मजे से रिश्ता निभा रहा है...।

Sunday, November 3, 2019

चिंगु

दिवाली की छुट्टियाँ नजदीक आ रही थीं। बच्चों ने मनाली, शिमला, नैनीताल आदि घूमने की डिमांड पहले से ही रख दी थी। भला बच्चों को मना भी कैसे किया जाए। इसी बहाने घर से बाहर निकालना भी हो जाता है और बच्चों के साथ एक बार फिर बच्चा बन बचपन जी लेते हैं हम। महानगरीय जीवन में तो काम – काज की भागम-भाग के अतिरिक्त कुछ नहीं। खैर...।
घूमने जाने की जोरों-शोरों से तैयारी जारी थी। बच्चों ने दादी के साथ बैठ सूची बनाई। कहीं कोई सामान रह न जाए। श्रीमती भी व्यस्त ही थी। सभी एक दूसरे से यही प्रश्न करते नजर आते कि यह रखा क्या ? वो रखा क्या ? सब सामान रख लिया न I कुछ रह तो नहीं गया न I माँ भी इन प्रश्नों को सुन-सुनकर तंग आ गई I आखिर बोल ही पड़ी, “ एक काम करो पूरा घर बाँधकर ले जाओ I अगर कोई सामान रह भी गया तो क्या ? क्या वहाँ कुछ नहीं मिलेगा ? जो रह जाए वहाँ खरीद लेना I एक-दो रुपए सस्ती क्या और मंहगी क्या ?” माँ की बात सुन सभी जोर से हँस पड़े I सामान रखने–रखाने के तनाव में उलझे हम सभी खिलखिला उठे I बात सही भी थी I जहाँ इतना खर्च हो रहा था, वहां छोटी-मोटी चीज की क्या परवाह करना I
  आखिर वह दिन आ गया जिस दिन हमें अपनी सैर के लिए रवाना होना था। बच्चों की खुशी का ठिकाना न था। कानपुर से दिल्ली तक का सफर हवाई यात्रा से पूरा कर हम दिल्ली पहुंचे। सब कुछ पहले से ही तय होने के नाते हमारे दिल्ली पहुंचने से पहले ही गाड़ी और ड्राईवर दोनों हाजिर थे। गाड़ी में बैठे-बैठे ही ड्राईवर ने हमें आधी दिल्ली तो यूं ही घुमा दी। बच्चे तो खुशी से कभी ताली बजा रहे थे, तो कभी अचरज भरी आवाज़ों से विस्मित हो रहे थे। हम सबके दिल उनकी खुशी देख कर से झूम रहे थे। कभी-कभी जिंदगी की व्यस्तता से निकलना भी कितना आवश्यक हो जाता है I व्यस्तता न जाने जीवन के कितने हसीन पलों को बड़ी ख़ामोशी से अपने आगोश में ले लेती है इसका हमें कभी आभास  ही नहीं होता I 
बच्चों की हंसी - खुशी भरे माहौल और रास्ते भर के प्रकृतिक नज़ारों का लुत्फ उठाते हुए हम मनाली पहुँच ही गए। ड्राईवर ने होटल के सामने गाड़ी रोकी और हमें भी उतरने का आग्रह किया। सफर आरामदायक था मगर दूरी कुछ लंबी होने से हम सभी बुरी तरह थक चुके थे।
    गाड़ी से उतरते उससे पहले ही होटल का वाचमैन 'जी साबजी' कहता हुआ हाजिर हो गया। मैं कुछ कहता, लेकिन उसने हमे बोलने का मौका ही न दिया। साबजी सामान की चिंता मत करो। सब आपके कमरे में आ जाएगा। आप तो बस हमारे होटल और शहर का मजा लीजिए। ड्राईवर ने भी कहा, “सर आप चिंता न करें। वाचमैन सामान आपके रूम में पहुँचा देगा I आप तो चेक इन कीजिए I”
   होटल में चेक इन की और हम सब अपने कमरों के बैड पर अपनी थकान मिटाने बिस्तर में जा धसे। कुछ गहरी नींद में उतरते उससे पहले ही ड्राईवर ने फोन पर मेसेज दिया कि घंटे भर में तैयार हो जाइए, हिडिंबा मंदिर देखने जाना है। कल रोहतांग पास के लिए निकलना है, तो देखना मुश्किल होगा।

ड्राइवर की बात सुन चाय-काफी और हल्के से नाश्ते से पेट को शांत किया। जल्दी-जल्दी तैयार हो निकल पड़े । पैगोडा की शैली में निर्मित इस मंदिर के परिसर की सुन्दरता और शांत वातावरण मन को हरने वाला अत्यंत सुंदर मंदिर है । यह मंदिर मनाली शहर के पास के एक पहाड़ पर स्थित है । मनाली आने वाले सभी सैलानी यहाँ जरूर आते है । देवदार वृक्षों से घिरे इस मंदिर की खूबसूरती बर्फबारी के बाद देखते ही बनती है । रात को लौटते हुए  खाना बाहर ही कर लिया। खाना बेहद स्वादिष्ट और गरमागरम था । पेट तो अपनी संतुष्टि दे चुका था, पर बेईमान मन कहाँ मानता है। ड्राइवर ने बताया कि हिमाचल में शादी-ब्याह, सामूहिक कार्यक्रम आदि के अवसर पर बनने वाले भोजन को ‘धाम’ कहते हैं और भोजन बनानेवालों को ‘बोटी’ कहते हैं I 
होटल लौटे तो देखा होटल के गेट पर वाचमैन के साथ उसके चार बच्चे भी पहरेदारी में पिता को साझादारी दे रहे थे। कुछ अटपटा लगा, मगर विवशता कदम थाम लेती है। ठंड काफी थी। उस ओर विशेष ध्यान दिए बिना ही हम अपने रूम में पहुँचे I हम सब अपनी अपनी रजाई और चिंगुओं में छिप गए। दोनों बच्चे आपस में कुछ खुसर-पुसर कर रहे थे। मैंने थोड़ा डांटा और सोने को कहा। मेरी आवाज़ सुन दोनों ने चुप्पी साध ली।
मेरे सोने के कोई दो घंटे बाद श्रीमती उठी । दोनों बच्चों को देख हतप्रभ रह गई। धीरे से आवाज़ लगा मुझे उठाया। हमारे दोनों बच्चे कैसे सिकुड़ कर सो रहे हैं। इनका चिंगु कहाँ गया ? यह सुनते ही मेरी आँखें खुल गईं । देखा तो दोनों बच्चे ऐसे ही उघडे सो रहे हैं। यह देखते ही मेरी नज़र दरवाजे की ओर दौड़ी, कहीं गलती से दरवाजा खुला तो नहीं रह गया। मगर ऐसा न था। बच्चों को अपनी रजाई से कवर कर मैंने मैनेजर को फोन करने के लिए रिसिवर उठाया ही था, बड़ी बेटी ने हौले से हाथ पकड़ लिया। पापा हमारा चिंगु ....। (कुछ सहमी सी आवाज में बोली)
  पापा आपके सोने के बाद मैं और  रोनित खिड़की के पास आ कर बैठ गए। हम दोनों आज बहुत खुश थे I इसलिए हमे नींद नहीं आ रही थी I हम दोनों आपस में बातें कर रहे थे कि आज आप लोगों के साथ घूमने में कितना मज़ा आया । बात करते हुए अचानक हमारी नजर वाचमैन के बच्चों पर पड़ी जो कड़कड़ाती ठंड में कंपकंपाते हुए गेट पर पहरा दे रहे थे। हम दोनों से देखा न गया । चुपके से उन्हें आवाज़ लगाई और खिड़की से ही उन्हें चिंगु थमा दिया। 
बच्चों की मासूमियत भरी बातें और उनकी सहृदयता देख आँखें नम हो आईं। 
खिड़की से उचक कर देखा तो चारों बच्चे उस एक चिंगु में ही अपने को समेटे सुकून की नींद भर रहे थे। आज मैं निशब्द था।

अगली सुबह मैनेजर को होटल के बिल के साथ चिंगु की कीमत अदा कर, सफर के अगले पड़ाव की ओर बढ़ गए हम । अनजाने में ही सही मगर बच्चों ने जीवन का बहुत बड़ा फलसफा सिखा दिया।


* चिंगु – कम्बल 
* उघडे – बिना ढके 

Saturday, November 2, 2019

हिंदी भाषा : भारत की पहचान



        वर्तमान में हिंदी भाषा अपने आप में एक चिंता का मुददा बन चुकी है I भारत में हिंदी समझने और बोलने वालों की संख्या करीब 70 करोड़ है I देश से बाहर भी करोड़ों लोग इसे ​जानते-समझते हैं I प्रयोग करने वालों की संख्या के लिहाज से हिंदी चीन की मंदारिन के बाद दुनिया की दूसरी सबसे बड़ी भाषा है I दर वर्ष हिंदी दिवस के उपलक्ष्य में हिंदी का महत्त्व, हिंदी का विकास, हिंदी के गिरते स्तर आदि की चर्चा बड़े जोरों–शोरों से की जाती है I कई सरकारी और गैर सरकारी कार्यालयों में वाद-विवाद प्रतियोगिताएँ, हिंदी पखवाड़े, भाषण, वक्तृत्व प्रतियोगिताओं आदि का आयोजन भी किया जाता है I हिंदी का इतना मान, उसके नाम पर की जाने वाली विभिन्न स्पर्धाएँ, व्याख्यान, सम्मान समारोह, हिंदी के विकास के लिए खाई जाने वाली सौगंध आदि मात्र खानापूर्ति ही लगते हैं क्योंकि ये सभी प्रतिक्रियाएँ और आयोजन हिंदी दिवस तक ही दिखाई देते हैं I उसके पश्चात हिंदी के लिए बड़ी-बड़ी कसमें खाने वालों को भी वर्ष भर हिंदी की कोई सुध नहीं रहती तथा स्वयं ही हिंदी की उपेक्षा करने लगते हैं I
1909 में जब महात्मा गांधी ‘हिंद स्वराज’ लिख रहे थे तो जापान से भाषा और शिक्षा की सीख लेने की बात करते हुए गांधी जे ने कहा था, ‘मुझे तो लगता है कि हमें अपनी सभी भाषाओं को चमकाना चाहिए....प्रत्येक पढ़े-लिखे भारतीय को अपनी भाषा का, हिन्दू को संस्कृत का, मुसलमान को अरबी का, पारसी को फारसी का ज्ञान होना चाहिए और हिन्दी का ज्ञान तो सबको होना चाहिए I कुछ हिन्दुओं को अरबी और कुछ मुसलमानों और पारसियों को संस्कृत सीखनी चाहिए I उत्तर और पश्चिम भारत के लोगों को तमिल सीखनी चाहिए I सारे भारत के लिए जो भाषा चाहिए, वह तो हिन्दी ही होगी I उसे फारसी या देवनागरी लिपि में लिखने की छूट रहनी चाहिए I हिन्दू और मुसलमानों में सद्भाव रहे,  इसलिए बहुत से भारतीयों को ये दोनों लिपियाँ जान लेनी चाहिए I ऐसा होने पर हम आपस के व्यवहार में अंग्रेजी को बाहर निकाल कर सकेंगे I’ गांधी जी की दूरदृष्टि ने हिंदी और उसके महत्त्व आंक लिया था I हिंदी सीखने और आत्मसात करने के कौशल को बड़ी बारीकी से व्यक्त किया था I
किसी भी राष्ट्र की पहचान उसकी भाषा और संस्कृति से होती है और पूरे विश्व में हर देश की एक अपनी भाषा और अपनी एक संस्कृति है जिस छाव तले उस देश के लोग पले-बड़े होते हैं I यदि कोई देश अपनी मूल भाषा को छोड़कर दूसरे देश की भाषा पर आश्रित होता है उसे सांस्कृतिक रूप से गुलाम माना जाता है क्योंकि जिस भाषा को बच्चा जन्म से लेकर अपने जीवन भर बोलता है लेकिन आधिकारिक रूप से उसे दूसरी भाषा पर निर्भर रहना पड़े तो कही न कही उस देश के विकास में उस देश की अपनाई गयी भाषा ही सबसे बड़ी बाधक बनती है क्योंकि बच्चा जिस भाषा का उपयोग अपने बचपन से करता है वह उसी भाषा में अपने सभी कार्यों को करने का प्रयास करता है, जिस वजह से वह अपनी मातृभाषा से दूर होता जाता है और यही दूसरी भाषा हमारे विकास में बाधक जरुर बनती है I 
१४ सितम्बर १९४९ को सविधान की भाषा समिति ने हिंदी को राजभाषा के पद पर आसीन किया क्योंकि भारत की बहुसंख्यक जनता द्वारा हिंदी भाषा का प्रयोग किया जा रहा था। स्वाधीनता आंदोलन के दौरान हिंदी भाषा में प्रकाशित पत्र-पत्रिकाओं ने देश को आज़ाद करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई तथा भारतीयों को एक सूत्र में बांधे रखा। स्वतंत्रता के पश्चात भले ही हिंदी को राष्ट्रभाषा व राजभाषा का दर्जा दिया गया लेकिन भाषा के प्रचार व प्रसार के लिए सरकार द्वारा सराहनीय कदम नहीं उठाए गए व अंग्रेजी भाषा का प्रयोग अनवरत चलता रहा। भले ही आज हिंदी की वैश्विक स्थिति काफी बहेतर है विश्व के अनेक देशों के विश्व विद्यालयों में हिंदी अध्ययन-अध्यापन हो रहा है। परन्तु विडंबना यह है कि विश्व में अपनी स्थिति के बावजूद हिंदी भाषा अपने ही घर में उपेक्षित जिंदगी जी रही है। जहाँ गुड मॉर्निग से सूर्योदय और गुड इवनिंग से सूर्यास्त होता है। अंग्रेजी बोलने वालों को तेज तरार एवं बुद्धिमान एवं हिंदी बोलने वालों को अनपढ़ एवं गवार जताने की परम्परा रही है। राजनेताओं द्वारा हिंदी को लेकर राजनीती की जा रही है। हिंदी हमारी दोहरी नीति का शिकार हो चुकी है। यही कारण है कि हिंदी आज तक व्यावहारिक द्रष्टि से न तो राजभाषा बन पाई और न ही राष्ट्रभाषा I हिंदी भाषा का इतिहास लगभग एक हजार वर्ष पुराना माना गया है। हिंदी भाषा व साहित्य के विद्वान अपभ्रंश की अंतिम अवस्था ‘अवहट्ठ’ से हिंदी का उद्भव मानते हैं, जिसे पंडित चंद्रधर शर्मा गुलेरी ने ‘पुरानी हिंदी’ नाम दिया। हिंदी का क्षेत्र बहुत विशाल है तथा हिंदी की अनेक बोलियाँ (उपभाषाएँ) हैं। इनमें से कुछ में अत्यंत उच्च श्रेणी के साहित्य की रचना भी हुई है। कबीरदास, सूरदास, तुलसीदास, मीराबाई, मलिक मुहम्मद जायसी, बोधा, आलम, ठाकुर जैसे कवियों की रचनाएँ इसका उदाहरण हैं। इन बोलियों में ब्रजभाषा और अवधी प्रमुख हैं। ये बोलियाँ हिंदी की विविधता हैं और उसकी शक्ति भी। वे हिंदी की जड़ों को गहरा बनाती हैं। हिंदी की बोलियों में प्रमुख हैं- अवधी, ब्रजभाषा, कन्नौजी, बुंदेली, बघेली, भोजपुरी, हरियाणवी, राजस्थानी, छत्तीसगढ़ी, मालवी, झारखंडी, कुमाउँनी, मगही आदि।
हम जानते हैं कि किसी भी आजाद देश की अपनी एक राष्ट्रभाषा होती है, जो उसका गौरव होती है तथा राष्ट्रीय एकता और राष्ट्र के स्थायित्व के लिए पूरे देश में उसका उपयोग होता है। इसी तरह देश की अपनी एक राजभाषा भी होती है, राजभाषा मतलब सरकारी कामकाज की भाषा और जिससे एक आम नागरिक भी सरकार के कामकाज को समझ सके। हिंदी को भारत में राजभाषा का दर्जा प्राप्त है। किसी भी भाषा को राजभाषा बनने के लिए उसमें सर्वव्यापकता, प्रचुर साहित्य रचना, बनावट की दृष्टि से सरलता और वैज्ञानिकता, सब प्रकार के भावों को प्रकट करने की सामर्थ्य आदि गुण होने अनिवार्य होते हैं। यह सभी गुण हमारी हिंदी भाषा में हैं।
अप्रैल, 2017 में राष्ट्रपति प्रणव मुखर्जी ने 'संसदीय राजभाषा समिति' की सिफारिश को 'स्वीकार' कर लिया कि राष्ट्रपति और ऐसे सभी मंत्रियों और अधिकारियों को हिंदी में ही भाषण देना चाहिए और बयान जारी करने चाहिए, जो हिंदी पढ़ और बोल सकते हों। मई, 2018 अखिल भारतीय तकनीकी शिक्षा परिषद (एआईसीटीई) ने हिन्दी माध्यम से इंजीनियरिंग की शिक्षा की अनुमति प्रदान की गई । 17 जुलाई, 2019 सर्वोच्च न्यायालय ने अपने सभी निर्णयों का हिन्दी या अन्य पाँच भारतीय भाषाओं (असमिया, कन्नड, मराठी, ओडिया एवं तेलुगु ) में अनुवाद प्रदान करना आरम्भ किया। 
राष्ट्रीय स्तर पर हिंदी भाषा के अस्तित्व को बनाए रखने और बढ़ावा देने हेतु मोदी सरकार द्वारा कुछ ऐसे कदम उठाने चाहिए जिससे हिंदी की वैज्ञानिक आधारशिला और शक्ति को बल दिया जा सके I हिंदी भाषा और साहित्य के विकास के लिए कुछ ऐसा करें जो पिछले 71 सालों में नहीं हुआ I सभी हिंदी प्रदेशों में ‘त्रिभाषा सूत्र’ को प्रबलता से लागू करना चाहिए तथा कठोर प्रावधान का आयोजन किया जाना चाहिए I जिस प्रकार त्रिभाषीय सूत्र होने पर भी अंग्रेजी माध्यम के विद्यालयों में छात्रों को अंग्रेजी में संवाद करने हेतु सख्त नियम बनाए जाते हैं I हिंदी प्रदेशों में दूसरे राज्यों की भाषा पढ़ाने के साथ-साथ संस्कृत भाषा का अध्यन-अध्यापन किया जाए I दूसरे राज्यों अर्थात गैर हिंदी प्रदेश की भाषा में पढ़ने-पढ़ाने के फलस्वरूप अन्य राज्यों में हिंदी कामकाजी भाषा के रूप में स्वीकार्य करने में आसानी से सहमती प्राप्त की जा सकेगी I हिंदी भाषा को किसी भी अन्य राज्य पर थोपा नहीं जा सकता है I हिंदी के सरकारी शब्दकोश और अन्य दस्तावेजों से हिंदी के क्लिष्ट शब्दों को हटा देना चाहिए जिनसे हिंदी का मजाक उड़ाया जाता है और जिससे वह बोझिल प्रतीत होती है I  वैज्ञानिक और तकनीकी शब्दावली आयोग का पुनर्गठन किया जाना चाहिए I साथ ही शब्द निर्माण के मामले में अब तक की नीति को छोड़ना होगा I तभी हिंदी का विकास संभव है I विज्ञान और तकनीकी युग में स्कूली शिक्षा में बच्चों को जिस प्रकार संगणक पर इंग्लिश शब्द टंकण करना सिखाया जाता है उसी प्रकार हिंदी कीबोर्ड और शब्द टंकण का अभ्यास भी कराना चाहिए I देश के सभी राज्यों के स्कूलों में कक्षा दसवीं तक हिंदी का अध्यन करना अनिवार्य है इस अनिवार्यता को स्नातोकतर बढ़ाना चाहिए I हिंदी से जुड़े रोजगारों को और व्यवसायों को बढ़ावा देना चाहिए I सोशल मीडिया पर उपलब्ध अंग्रेजी प्रलेखों के हिंदी अनुवाद की व्यवस्था की जाए I जिससे हिंदी भाषी उन प्रलेखों को हिंदी में पढ़ जानकारी प्राप्त कर सके I राष्ट्रीय स्तर पर होने वाली लिखित परीक्षाओं के साथ – साथ राज्य स्तर की लिखित परीक्षाओं को भी हिंदी में लिखने का प्रावधान होना चाहिए I सरकार को सुप्रीम कोर्ट से परामर्श करके देश की अदालतों में हिंदी को जिरह करने और फैसला लिखने की भाषा बनाने का प्रयास करना चाहिए I एक ही शब्द के अनेक रूप में लिखने के कारण अचूकता की सम्भावना बानी रहती है इसलिए शब्दों की मानकता का निर्धारण किया जाए I जिससे ऐसी त्रुटियों से बचा जा सके I हिंदी के विकास की बगदौड़ किसी ऐसे मंत्री के हाथों में सौपनी चाहिए जिसे हिंदी की जानकारी और हिंदी के प्रति रुझान हो न कि ऐसे मंत्रियों को जिनका हिंदी से दूर-दूर तक नाता ही न हो I
केन्द्रीय सरकार को इन उपायों के अतिरिक्त हिंदी के अनुकूल तकनीकी विकास में भी रुझान बढ़ाना चाहिए जिससे इस क्षेत्र में अनुसंधान तेज करने के लिए निजी क्षेत्रों को भी प्रोत्साहित किया जा सकेगा I हालांकि इन सभी कार्यों को बिना राजनीतिक इच्छाशक्ति, स्पष्ट कार्ययोजना, संवेदनशीलता और ईमानदारी के कुछ भी किया जाना संभव नहीं है I आम जानता और हिंदी प्रेमियों के लिए मात्र एक स्वप्न जैसा ही है।

               

                     डॉ. पूजा हेमकुमार अलापुरिया ‘हेमाक्ष’ 

emotions

जिंदगी उसूलों से नहीं बल्कि अपनो से हो, 
तो स्वादिष्ट और चटपटी लगती है....
         डॉ पूजा अलापुरिया।

मनुष्यता - मैथिलीशरण गुप्त

    मनुष्यता                                               -  मैथिलीशरण गुप्त  विचार लो कि मर्त्य हो न मृत्यु से डरो कभी¸ मरो परन्तु यों मरो...