Tuesday, December 3, 2019

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                       "परिवार एक संगठित इकाई है, जिसने जानी कीमत इसकी वही मनुष्य सुखदाई है I"
                                            - डॉ. पूजा हेमकुमार अलापुरिया 
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"परिवार" विचार



" चाय की सर्द - गर्म चुस्कियों के स्वाद सा होता है परिवार,
कभी कडवा तो कभी मीठा एहसास दिलाता है परिवार I

मनुष्य की पहले पहचान उसके परिवार से है

"मनुष्य की पहले पहचान उसके परिवार से है "

जागते रहो !








   चौकीदार चाचा नमस्ते, कैसे हो ?
अरे, बिटिया कब आए ससुराल से ? (थोड़ा रुक कर) सब बढ़िया है तुम्हारे परिवार में ?

हां चाचा सब बढ़िया है I आप सुनाओ I चाची कैसी है ?

बिटिया तुम इतने सालों में आती हो, खैर खबर ही नहीं तुम्हें I
 क्यों चाचा ऐसा क्यों बोल रहे हो आप ?
 चाची तो ठीक है ना ?

3 सालों से तुम्हारी चाची ने खाट पकड़ ली है उसे उठाने-बैठाने के लिए भी एक इंसान चाहिए I मैं ठहरा बूढ़ा अब इस शरीर में इतनी जान नहीं बची है, बस राम भरोसे ही गाड़ी खिंच रही है

चाचा आज ही आई हूँ एक दिन चाची से मिलने आती हूँ

आपका बेटा शंकर है ना I क्या वह चाची का ख्याल नहीं रखता I अब तो काफी बड़ा हो गया होगा I उसकी शादी हुई या नहीं I

 हाँ बिटिया बेटा भी है और बहू भी I
 मगर दोनों ही बेकार I दोनों हमारे किसी काम के नहीं I  बहू को तो हम दोनों बुड्ढा - बुड्ढी बिल्कुल नहीं सुहाते हैं बेटे को भी बहू की बातें सुनाई देती है छोड़ो बेटा यह तो कर्मों का फल है जैसा बोया होगा, आज वैसा ही काट रहे हैं
       चाचा मुझे आज भी याद है आप अपना कर्तव्य पूरी निष्ठा और ईमानदारी से निभाया करते थे I और आज भी... I आपके स्वभाव और अपनेपन में भी कोई कमी नहीं आई है
       चाचा जब हम इस शहर में रहने आए थे, तब आधी रात को पहली बार आपकी आवाज सुनकर मैं काँप गई थी कई दिनों तक ज्वर से पीड़ित रही रात होते ही भय मुझे जकड़ लेता  कि अभी खूंखार, भयावह और विशालकाय वाला कोई आएगा I फिर जोर-जोर से बजती सीटियों के साथ “जागते रहो ! जागते रहो ! की आवाज मेरे कानों को चीरती मेरे हृदय तल पर एक कौंध-सी  उभर गई थी I रह-रह कर मन में ही बात आती कि एक दिन यह व्यक्ति मुझे चुरा कर ले जाएगा I

 अच्छा बिटिया ! मुझे तो पता ही नहीं I बिटिया तुम्हारे हृदय से मेरी भयावहता का भय कैसे निकला I
 दोनों खिलखिला कर हँसते हैं I  हँसते हुए बिटिया कहती है, चाचा आज मुझे हँसी आ रही है मगर उन दिनों तो मेरी स्थिति बहुत भयावह थी I
 बिटिया हँसो,  मगर बता तो दो…...I
 हाँ-हाँ, चाचा बताती हूँ I मम्मी-पापा ने खूब समझाया, मगर मैं मानने के लिए तैयार ना थी I
 अरे ! चाचा खड़े क्यों हो ? अंदर आ जाइए I क्या सारा किस्सा यहीं देहरी पर ही सुनोगे I
 नहीं-नहीं बिटिया I मैं यही ठीक हूँ ...
अरे चाचा कैसी जिद करते हैं आप I अंदर आ जाइए I
नहीं बिटिया I यहीं देहरी पर बैठ जाता हूँ I अब तुम बताओ फिर क्या हुआ ?
हाँ चाचा बताती हूँ I मुझे आज भी याद है कि किस तरह से आपका परिचय हुआ था I मैं उस दिन को कभी नहीं भूल सकती I  
      क्यों बेटा ? ऐसा क्या हुआ था जो मेरे परिचय का दिन तुम्हारी स्मृति में आज भी समाया हुआ है I
 जी चाचा I रात की चौकीदारी के उपरांत अगली सुबह आप अपनी तनख्वाह लेने घर-घर दस्तक दे रहे थे I पापा घर पर ही थे I मैं और पापा छत पर रखे पौधों पर पानी छिड़क रहे थे I तभी आपने पड़ोस वाले ताऊजी के घर का कुंडा खटखटाया I काफी देर तक दरवाजा खटखटाने पर भी भीतर से कोई प्रतिक्रिया न दीखाई दी I आपने एक बार और प्रयास किया शायद कोई दरवाजा खोल दे I मगर ....I आप निराश हो हमारे घर की ओर कदम बढ़ा ही रहे थे कि ताऊ जी के बड़े बेटे ने दरवाजा खोला I दरवाजा खुलते ही आपके चेहरे पर उम्मीद की एक लहर दौड़ पड़ी I आप मुस्कुराते हुए मुड़े ही थे कि तभी संजीव भैया भार्राते स्वर में आप पर बरस पड़े I

क्यों भई अँधा–बहरा है क्या तू ? समझ नहीं आता क्या ? जब एक बार में दरवाजा नहीं खोला तो उसे पीटने की क्या जरूरत है I (संजीव चौकीदार से कहता है )
साब जी मैं तो ...I
क्या मैं तो ?
साब जी मैं तो अपने पैसे लेने आया था I
अरे! कैसे पैसे ? क्या हमने तुमसे लिए हैं ? या तू देकर भूल गया है I
नहीं साब जी I मैं तो रात की चौकीदारी के पैसे मांग रहा था I
कैसी चौकीदारी I तुम सबके सब निठल्ले हो I रात को मुहल्ले में जो चोरियाँ होती है उसमें तुम लोगों का ही हाथ होता है I चौकीदारी के नाम पर रात को चोरियाँ करवाते हो तुम I आज तो आ गया है फिर से दिखाई न देना यहाँ I चोर कहीं के I
साब जी गाली मत दो I हम पूरी इमानदारी से चौकीदारी करते हैं I
हाँ, हाँ, हमें पता है कि तुम कितनी ईमानदारी से ....I
साब जी मेरा मेहनताना दे दो I
मेरे घर से तुम्हें कुछ नहीं मिलेगा I अपना रास्ता नापों ...I
संजीव भैया ने न जाने क्या- क्या आरोप आप पर थोपने शुरू कर दिए I आप बड़ी शालीनता और धैर्य बांधे चुपचाप खड़े रहे I
संजीव भैया के ऊँचे और कटु स्वर ने पूरे मुहल्ले को इकट्ठा कर लिया I
पापा ने छत के छज्जे से जो दृष्टि गली में फेरी तो देखा पूरा मुहल्ला इकत्रित हो चुका है I पापा मुझे साथ लेकर गली की ओर दौड़े I एक निर्दोष और इमानदार के साथ कैसी नाइंसाफी की जा रही है और सब तमाशा देख रहे हैं I
क्या हुआ संजीव ? पापा ने भैया से पूछा I
चाचा जी देखो कैसी धौंस जता रहा है, ये दो टके का चौकीदार I एक तरफ कामचोरी करते हैं और दूसरी तरफ पैसे मांग रहा है I
हाँ संजीव तुम ठीक कह रहे हो I
पापा की बात सुन संजीव की ख़ुशी का ठिकाना न रहा I मगर आप (चौकीदार) की निराशा स्पष्ट झलक रही थी I वहाँ उमड़ी भीड़ भी यही सोचने लगी की संजीव अब तक जो कह रहा था सब ठीक था I लोगों के चेहरे पर भी चमक सी आ गई I मैं चुपचाप सब सुन और देख रही थी I
संजीव एक बात बताओ हमारे मुहल्ले में अब तक कितनी चोरियाँ हुई है ?
एक भी नहीं चाचाजी I
कभी कोई हत्या या खून खराबे की बारदात हुई है क्या ?
नहीं चाचाजी I
आधी रात को किसी के घर में घुसने की कोई घटना ?
नहीं चाचाजी I
देर रात को लौटते समय तुम्हारे या परिवार के साथ कोई छेड़-छाड़, बतमीजी, झडप, लूटपाट आदि ऐसा कुछ हुआ क्या ?
नहीं चाचाजी I
ऐसी कोई रात जब तुम्हारा परिवार असामाजिक तत्वों की चिंता के कारण ठीक से सो न पाया हो ?
नहीं चाचाजी I ऐसा कभी नहीं हुआ I
अच्छा एक बात और बताओ I
हाँ, पूछिए न चाचा जी I
तुम्हें हर महीने ऑफिस से कितनी छुट्टियाँ मिलती है ?
यही कोई चार I मगर चाचा मैं आपकी बात समझा नहीं I और इन सब बातों से इस बहादुर का क्या मतलब ?
    संजीव मतलब है I बहादुर पूरा साल एक भी दिन नागा किए बिना ही अपनी जिम्मेदारी और कर्तव्य को पूरी शिद्दत से निभाता है I कभी किसी से ज्यादा पैसा नहीं मांगता I जो कोई अपनी ख़ुशी से जो दे देता है, बेचारा चुपचाप ले लेता है I तुमने इस निर्दोष पर बिना सोचे समझे न जाने कैसे-कैसे आरोप लगा दिए I अपने प्राणों की परवाह किए बिना पूरी रात निष्कपट भाव से हमारी रखवाली करता है I संजीव अभी तुमने ही कहा हमारे मुहल्ले में कभी भी ऐसा कुछ भी नहीं हुआ जिसके लिए बहादुर को दोषी ठहराया जाए I इनको भी इज्जत प्यारी होती है I ये भी आत्मसम्मान की भावना रखते है I गरीब जरूर है, मगर सबसे पहले ये हमारी-तुम्हारी तरह ही इनसान है I 
पापा की बात सुन सभी के चेहरे फीके से पड़ गए I
      चाचाजी मुझे माफ़ कर दो I मैं बिना वजह ही बहदुर पर चढ़ गया I संजीव ने अपनी जेब से पैस निकाले और बहादुर को थमाते हुए क्षमा मांगी I

बिटिया तुम्हें तो सब याद है I मैं तो कब का भूल चुका था इस घटना को I
चाचा यही तो खासियत है आपकी I
बस फिर क्या था पापा ने घर आकर मुझे बताया कि आप वही हैं जो रात भर जाग कर हमारी रक्षा करते है और जोर-जोर से सीटी बजाकर कहते हैं “ जागते रहो I” (दोनों खिलखिला कर हँस पड़े I )

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Wednesday, November 27, 2019

मिक्कू

    





      रिसेस की घंटी बजी I सभी बच्चे क्लास से बाहर निकलते हैं I कुछ हाथ धोने, तो कुछ कैंटीन, कुछ अपने भाई-बहन की क्लास से अपना टिफ़िन लेने, तो कुछ स्कूल के मेन गेट पर अपना टिफ़िन लेने I इतने में रोमा मिस क्लास में आती है I देखती है पूरी क्लास में मिक्कू अकेला बैठा है I जैसे ही मिक्कू ने देखा कि रोमा मिस है तो अपना टिफ़िन छुपाने लगा I
      रोमा मिस समझ गई, जरूर कुछ गड़बड़ है I वह मिक्कू के पास गई और पूछा, “मिक्कू आज तुम्हारे टिफ़िन में स्पेशल क्या है ?”
  मिक्कू अपना टिफ़िन छुपाने लगता है I नहीं-नहीं ! कुछ भी स्पेशल नहीं है मिस I बस sss.....!
      “बस, क्या मिक्कू ?”
   मिस आज... मैं टिफिन में ..में ..I
“बोलो ! मैं क्या ?”
मिस मैं बिस्किटस लाया हूँ I
तो इसमें इतना छिपाने की क्या बात ?
(कुछ घबराते हुए ) आप विज्ञान की टीचर है और .....I
मिक्कू चुप क्यों रह गए ? बोलो I
   मिस मुझे टिफिन में चपाती-भाजी, दाल-राइस, पुलाव आदि बिलकुल भी पसंद नहीं है I माँ हर रोज टिफिन रखते समय यह कहती है, “ ये लो तुम्हारा संतुलित और पैष्टिक टिफिन I”
लेकिन हर रोज़ मैं अपना टिफिन दोस्तों को बाँट देता हूँ I वे बड़ा स्वाद लेकर ....I
 तो मिक्कू आज तुम्हारा संतुलित और पौष्टिक टिफिन किधर है ?
मिस मैं हर रोज़ माँ से यही कहता हूँ कि मुझे भी अन्य बच्चों की तरह कैंटीन का खाना पसंद है I मैं उन से पैसे मांगता हूँ, तो वह मना करती हैं I आज उन्होंने मेरी इस हरकत की वजह से मेरे लिये टिफिन नहीं बनाया I
      तो तुम्हारे टिफिन में ये बिस्किटस.....?
दीदी ने रखें ....I
      मिक्कू तुम दुनिया के सबसे लक्की बच्चों में से हो I
वो कैसे मिस ? मुझे तो नहीं लगता I
    नहीं ! ऐसा नहीं है I तुम्हारी माँ हररोज बड़े प्यार से तुम्हारे लिए जल्दी उठकर ताज़ा और पौष्टिक खाना बनती है, ताकि तुम कभी अस्वस्थ न हो इसलिए ....I एक बात और, तुम्हें पाता है कि पूरे स्कूल में तुम उन गिने-चुने छात्रों में हो जो पिछले कई सालों से क्लास में कभी अनुपस्थित नहीं हुए और न ही बीमारी के कारण जल्दी घर गए हो I
    इस बात का पूरा श्रेय तुम्हारी मम्मी को ही जाता है I जो तुम्हें जी-जान से स्नेह करती और यही चाहती है कि तुम सदैव स्वस्थ रहो और जीवन की हर परीक्षा में अव्वल आते रहो I स्कूल में होने वाली सभी प्रतियोगिताओं में श्रेष्ठ स्थान प्राप्त करो I
      रोमा मिस टिफिन की वजह से कैसे ?
    घर में बना खाना संतुलित और पौष्टिक आहार होता है I उस खाने में किसी तरह के रासायनिक पदार्थों और रंगों का प्रयोग नहीं किया जाता है I इसलिए तुम्हारे टिफिन में वे सभी पोषक तत्व होते है जो एक संतुलित भोजन में होने चाहिए I
      संतुलित, पौषक तत्व ......? मैं समझा नहीं मिस I
   हमारे शारीर के लिए प्रोटीन, विटामिन, वसा, खनिज, कार्बोहाइड्रेट आदि की आवश्यकता होती है I इन तत्वों में किसी एक का भी संतुलन बिगड़ने पर हम बीमार पड़ सकते हैं I 
      मिस ये सभी पौषक तत्व हमें किससे मिलते हैं ?
   प्रोटीन दाल, दूध, दही, मछली, अंडा, अनाज, हरी सब्जियों आदि में मौजूद रहते हैं, जो हमारे शारीरिक विकास के साथ-साथ मांसपेशियों व हड्डियों को भी मजबूत बनता है I विटामिन कई प्रकार के होते हैं – विटामिन ए, बी, सी, ई और के I इन विटामिन के भी अपने कई प्रकार हैं I विटामिन किन खाद्य पदार्थों से मिलता है, मैं तुम्हे बताती हूँ – दूध, मक्खन, टमाटर, नीबू, खट्टे रसीले फल, सूरज की किरणें, सोयाबीन, सेब, मूली, गाजर, मांस आदि I
   रोमा मिस की ज्ञानवर्धक बातें सुन मिक्कू की जिज्ञासा बढ़ने लगी I जिज्ञासापूर्वक मिस से कहता है, “मिस कार्बोहाइड्रेट और खनिज के बारे में भी कुछ बताओ न I”
   तो सुनो मिक्कू कार्बोहाइड्रेट गुड, शक्कर, शकरकंदी, शहद, आलू, सिंघाड़ा, अंगूर, आम आदि में बहुतायत मात्रा में पाया जाता है I ये सभी तत्व हमें उर्जा प्रदान करते हैं I और रही बात खनिज की, तो खनिज पालक, केला, पनीर, बाजरा, मूंगफली, अंडे, नमक, हरी सब्जियों आदि में पाया जाता है I इन खनिज तत्वों से हमें आयोडीन, कैल्शियम, फास्फोरस, लोहा और सोडियम मिलता है I आयोडीन घेंघा रोग से बचाता है, कैल्शियम हमारे दांतों की मजबूती को बरकरार रखता है, फास्फोरस हमारी हड्डियों के लिए अति आवश्यक है I यह हमारी हड्डियों को कमजोर नहीं होने देता I हमारे शारीर में बहने वाले रक्त को हिमोग्लोबिन लोहइ से ही मिलता है I सोडियम हमारे शारीर में उचित जल संतुलन बनाये रखने में मदद करता है, इतना ही नहीं यह ह्रदय कि धड़कन को सामान्य बनाये रखने में भी मदद करता है I
मुझे तो पता ही न था कि माँ जो खाना हमें रोज परोसती है, उस खाने में प्रोटीन, विटामिन, खनिज आदि छुपे होते हैं I मिस आज ........ज ...I
 टन–टन–टन रिसेस ख़त्म होने की घंटी बजती है I
 ( ख़ुशी से ) मिक्कू अपनी बात पूरी करते हुए, “थैंक्स रोमा मिस ! आज सिर्फ आपकी वजह से मुझे खाद्य पदार्थो के विषय में इतनी गहन जानकारी मिली I घर पहुंचकर सबसे पहले माँ से सॉरी कहूँगा I मैं उनके स्नेह और अपनत्व को न समझ सका I बिना वजह ही माँ के साथ दुर्व्यवहार किया I मैं आपसे वादा करता हूँ कि आज के बाद बाहर के खाने के लिए माँ से जिद्द नहीं करूँगा और (मुस्कुराते हुए) अब से रिसेस में सिर्फ संतुलित एवं पौष्टिक टिफिन ही रहेगा I अपने दोस्तों को भी इसकी जानकारी दूँगा I वे संतुलित और पौष्टिक भोजन का ही सेवन करें, ताकि वे भी कभी बीमार न पड़े I” motivational story

Tuesday, November 26, 2019

शादी में जरूर आना


    




   पिछले कई महीनों से सलोनी के बैंक के कई काम रुके पड़े थे I अक्सर बैंक जाने की सोचती मगर कुछ न कुछ काम निकल आता और ....I ऑफिस की आज छुट्टी थी तो सोचा यही काम निपटा लिया जाए I वैसे भी बैंक के सभी काम अनमोल ही सँभालते है I घर का फटाफट काम निपटा सलोनी बैंक पहुँची I बैंक में काफी भीड़-भाड थी I सलोनी भीड़ देख समझ गई आराम से एक-डेढ़ घंटा तो लग ही जाएगा I कोई बात नहीं बेटा अब आ गए है तो काम निपटा कर ही जाऊँगी I एक लाइन में कुछ लोग ही खड़े थे I सलोनी ने सोचा पहले यही किया जाए, तब तक बाकी लाइन में भीड़ कम हो जाएगी I सलोनी भी लाइन में लग गई I सलोनी इंतजार कर रही थी अपना नंबर आने के लिए I तभी एक अधेड़ चुलबुली प्रवृति वाली महिला सलोनी के आगे आ कर खड़ी हो गई I सलोनी कुछ कहती, मगर उसके मन ने कहा कोई बात नहीं I उम्र में काफी बड़ी हैं जाने दो I अगर पाँच मिनट ज्यादा लग भी गए तो क्या ? हो सकता है पहले से ही इस लाइन में हो I शायद कुछ अधूरा रह गया होगा और अपने आगे खड़े आदमी से बोलकर गई हों I खैर ...I
      महिला हाथ में सभी कागजात लिए खड़ी थी I हाथों में एक मूवमेंट सी चल रही थी I जिसप्रकार  बच्चों में अपने पसंद की चीज पाने की ललक और उतावलापन होता है, वैसे ही वह भी कुछ उतावलापन लिए हुए थी I
      सलोनी ने उनसे बात करना शुरू कर दिया I शायद बातों की तारतम्यता में उनका उतवलापण कुछ कम हो जाए I काकी आपको फॉर्म भरना है ? लगता है काफी देर से परेशान हैं इस फॉर्म को लेकर I
      हाँ, बेटा फॉर्म तो भरना है I कब से चक्कर लगा रही हूँ कभी इस लाइन में तो कभी उस लाइन में I कभी ये काउंटर पर तो कभी वो काउंटर ... I

कैसा फॉर्म है जो आपको इतना दौड़ा रहे हैं ये लोग ?
 क्या बताऊँ बेटा I बस पूछो मत I “जीवन प्रमाण पत्र” का फार्म भरना है I
जीवन प्रमाण पत्र ? यह किस लिए होता है ?
      सभी पेंशनभोगियों को साल में एक बार जीवन प्रमाण पत्र बनवाना पड़ता है I और यह हर साल अक्टूबर – नवम्बर में ही होता है I बेटा इसके लिए कितनी लम्बी-लम्बी लाइन लगती है I किस्मत अच्छी हुई तो एक बार में ही काम हो जाता है I नहीं तो कभी सॉफ्टवेयर का झंझट तो कभी इन्टरनेट का I बड़ी मुसीबत है I जीने और खाने के लिए पैसा तो चाहिए I ये बुढ़ापे का शरीर और ये ....I
अगर यह फॉर्म न भरा जाए तो ?
  अगर यह फॉर्म नहीं भरा जाएगा तो पेंशन रोक दी जाती है I तब तो इससे भी ज्यादा भाग-दौड़ बढ़ जाती है I
वह कैसे ?
नेक्स्ट ?
( सलोनी के आगे खड़ी महिला काउंटर पर फॉर्म आगे बढ़ाते हुए ) बेटा ये लो I
नाम बताओ ?
फॉर्म में लिखा है न I ( कुछ मसखरी भरे अंदाज में )
काकी मुझे पता है फॉर्म में नाम है I नाम बताओ I
(मुस्कुराते हुए ) मीनाक्षी I
पासबुक लाइ हो ?
हाँ ! (पासबुक आगे बढ़ाते हुए ) ये लो I
वेरीफाई नहीं करवाया फॉर्म ?
पिछली बार तो पहचान के डॉक्टर ने वेरीफाई कर दिया था I
इसबार भी उन्हीं से करवा लेती I
      मैं गई थी मगर डॉक्टर चिल्ला रहा था I मैं क्यों सिग्नेचर करूं I किसी और के पास जाओ I अब बेटा मैं कहाँ – कहाँ धक्के खाऊं? हर महीने तो पेंशन आती ही है, तो वेरीफाई की क्या जरूरत ?
      जरूरत होती है इसलिए ही कहा जाता है I बिना वजह तंग करना हमारा काम नहीं हैI
नौकरी करती हो ?
      मैं ?
हाँ आपसे ही पूछ रहा हूँ I
नहीं I (एक विषण्ण मुस्कान में)
पेंशन खाता है ?
हाँ !
नौकरी करती थी ?
नहीं !
फिर ये पेंशन ?
पति गवर्मेंट जॉब में थे I
अच्छा I फॅमिली पेंशन है I
हाँ, फॅमिली पेंशन है I
बच्चे ?
चार बच्चे है I
(पीछे मुडकर ) कितने सवाल कर रहा है ?
जाने दो काकी I उनका काम है I
फॉर्म बराबर भरा है क्या ? कुछ बाकि तो नहीं I सुबह से चक्कर लगा रही हूँ I कभी एक नं. काउंटर तो कभी ....I
शादी की क्या ?
(बड़ी जोरदार हँसी का फब्बारा छोड़ते हुए ) अभी तो कहा पति गवर्मेंट जॉब में थे I तभी तो पेंशन मिल रही है I कैसी बात करते हो ? पूछने से पहले....I
शादी की क्या ? ( बैंक कर्मचारी फिर से सवाल दोहराता है )
अभी तो बताया I
मेरा मतलब है आपने दूसरी शादी की क्या ?
तोबा-तोबा ! कैसी बात करते हो बेटा I पूरी जिंदगी बीत गई I अब इस बुढ़ापे में दूसरी शादी करूँगी I  
हाँ या ना ...I
नहीं की I
   उस महिला और बैंक कर्मचारी की वार्तालाप लाइन में खड़े सभी सुन रहे थे I कोई कर भी क्या सकता था I
( शर्म से पानी-पानी हुई महिला सलोनी से कहती है ) कुछ भी पूछता है I अच्छा हुआ बच्चे नहीं आए I सुनते तो पता नहीं क्या बबाल होता ...I
      काकी जाने दो उनका काम है I शायद कुछ फोरमल्टी होती होंगी बैंक की I इसलिए ...I
(बैंक कर्मचारी एक फाइल आगे बढाता हुआ ) यहाँ सिग्नेचर करो I डेट और मोबाइल नंबर भी लिखना I
      अधेड़ मिनाक्षी फाइल हाथ में सँभालते हुए कहती है, “पेन है क्या ?”
ये लो काकी I (सलोनी पेन आगे बढाती है )
      महिला साइन कर फाइल आगे बढ़ाती है I
डेट और मोबाइल नंबर भी लिखना है I (कुछ रूखे स्वर में )
 कहाँ लिखना है डेट और मोबाइल ? (महिला सलोनी से पूछती है )
काकी साइन के नीचे डेट लिख दो और बॉक्स के साइड में मोबाइल नंबर I
      मीनाक्षी फाइल वापस करती उससे पहले ही बैंक कर्मचारी बोला, “ तुमने साइन क्यों किए ? बैंक रिकॉर्ड में तो अंगूठा है ? तुम्हारा ही अकाउंट है या किसी और का ?”
      मीनाक्षी कुछ गंभीर स्वर में बोली, “ अकाउंट मेरा ही है I मैं कभी अंगूठा नहीं लगती I पढ़ी-लिखी हूँ I साइन करना जानती हूँ I रिकॉर्ड बराबर चेक करो I मीनाक्षी साठे I लगता है आप किसी और मीनाक्षी से टेली कर रहे हैं I”

मीनाक्षी साठे ! पूरा पेज मीनाक्षी का है I गलती से ‘मीनाक्षी काटकर’ का रिकॉर्ड देख लिया I सॉरी
I
      लगभग दो मिनट बाद काकी का काम हो गया I सलोनी भी सोच रही थी छोटी लाइन सोच कर इस लाइन में लगी थी I मगर कितना वक्त लग गया I चलो जो हुआ I काकी ने अपने सभी पेपर और पासबुक वगैरह समेटी और चलते-चलते बैंक कर्मचारी को कहा, “शादी में जरूर आना !”
  वह सुन नहीं पाया I
      ( बड़े ही मजाकिया और रंगीन मिज़ाज में मीनाक्षी कहती है ) बेटा आपसे कह रही हूँ शादी में जरूर आना I  
      जाते-जाते सलोनी के कान में फूंक मार ही दी, “शादी में जरूर आना I”
 काकी की बात सुन लाइन में खड़े सभी लोग खिलखिला उठे I

Monday, November 25, 2019

today's thought







संसार की कोई भी भाषा छोटी या बड़ी नहीं होती,
बल्कि बड़े  या छोटे तो मनुष्य के विचार होते हैं।
  
           डॉ. पूजा हेमकुमार अलापुरिया 

मनुष्यता - मैथिलीशरण गुप्त

    मनुष्यता                                               -  मैथिलीशरण गुप्त  विचार लो कि मर्त्य हो न मृत्यु से डरो कभी¸ मरो परन्तु यों मरो...